देश के लोकतांत्रिक तंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील विषय पर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। मामला मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को किसी भी अधिकारिक काम के लिए जीवन भर की कानूनी छूट देने वाले कानून से जुड़ा है। इस कानून की वैधता पर याचिका दायर की गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया है। अदालत ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि क्या वास्तव में किसी भी अधिकारी को ऐसे शक्तिशाली अधिकार और सुरक्षा दी जा सकती है जो अन्य गणमान्य व्यक्तियों को संविधान ने नहीं दी है।

याचिका में आरोप और सवाल
याचिका में यह दावा किया गया है कि संसद ने एक ऐसा कानून बनाया है जो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके अधिकारिक कार्यों के दौरान किए गए किसी भी कार्य के लिए सिविल या क्रिमिनल मुकदमे से जीवन भर की छूट देता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह कानून संविधान द्वारा निर्धारित संतुलन के खिलाफ है और इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के न्यायिक अधिकारी भी ऐसी छूट प्राप्त नहीं करते और किसी विधि निर्माण प्रक्रिया में इस तरह का असाधारण अधिकार नहीं दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने याचिका पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यह विषय संवैधानिक महत्व का है और इसकी गहन जांच आवश्यक है। अदालत ने कहा कि यह देखना जरूरी है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को दी जाने वाली छूट संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं। अदालत ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और उनसे जवाब मांगा कि इस कानून के पीछे की औचित्य और उद्देश्य क्या हैं।
कानून का इतिहास और प्रावधान
इस कानून को “मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) बिल, 2023” के रूप में संसद में पारित किया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि चुनाव आयुक्त स्वतंत्र और निर्भीक होकर अपने कार्यों का निष्पादन कर सकें। हालांकि, याचिका में आरोप लगाया गया कि इस बिल के तहत चुनाव आयुक्तों को जीवन भर की सुरक्षा मिलती है, जो कि न्यायपालिका के किसी भी अधिकारी को नहीं दी गई है। यह आरोप संवैधानिक विशेषज्ञों के बीच भी बहस का विषय बन गया है।
संविधान और स्वतंत्रता का सवाल
याचिकाकर्ता के वकील का कहना है कि संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं में संतुलन और जवाबदेही बनाए रखने का प्रयास किया है। किसी भी अधिकारी को असाधारण शक्ति और मुकदमे से जीवन भर की छूट देने का अधिकार संविधान के मूल दृष्टिकोण के खिलाफ है। उनका तर्क है कि यदि चुनाव आयोग के अधिकारियों को ऐसी पूर्ण सुरक्षा दी जाती है तो इससे जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
लोकतंत्र और चुनाव आयोग की भूमिका
चुनाव आयोग लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह सुनिश्चित करता है कि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संपन्न हों। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका संवैधानिक रूप से स्वतंत्रता और निष्पक्षता की है। हालांकि, याचिका के अनुसार, जीवन भर की कानूनी छूट उनके कार्यों की जांच और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
संभावित प्रभाव और बहस
यदि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को गंभीरता से लेते हुए केंद्र और चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब मांगती है, तो यह न केवल कानून की वैधता पर सवाल उठाएगा बल्कि भविष्य में संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही और अधिकारों के संतुलन पर भी प्रभाव डाल सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला लोकतंत्र और संविधान की नींव से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच करने का अवसर प्रदान करता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई ने यह संदेश दिया है कि किसी भी संवैधानिक संस्था को असाधारण अधिकार और सुरक्षा देने का कदम संवैधानिक दृष्टिकोण से जांचा जाएगा। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका लोकतंत्र में बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके अधिकार और सुरक्षा की सीमा संवैधानिक रूप से तय होनी चाहिए। आने वाले समय में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय देश की न्यायिक और संवैधानिक धारा के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है। harigeet pravaah मानता है कि यह मामला लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संतुलन, स्वतंत्रता और जवाबदेही का एक अहम उदाहरण बन गया है।
