दक्षिण-पूर्व एशिया एक बार फिर युद्ध की दहलीज़ पर खड़ा दिख रहा है। थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमाई तनाव ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। थाई सेना ने अपने पड़ोसी देश कंबोडिया पर आरोप लगाया है कि उसने सीमा क्षेत्र में नई बारूदी सुरंगें बिछाई हैं, जिनकी वजह से थाई सैनिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं। यह घटना ऐसे समय हुई है जब दोनों देशों के बीच वर्षों पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता में हुए शांति समझौते को ‘सहयोग की मिसाल’ माना जाता था। लेकिन अब थाईलैंड ने इस समझौते को “निलंबित” कर दिया है — जिससे यह संकेत मिला है कि दक्षिण-पूर्व एशिया का यह क्षेत्र एक बार फिर सैन्य संघर्ष की दिशा में बढ़ सकता है।

सीमा पर धमाके की गूंज और घायल सैनिक
थाईलैंड के रक्षा प्रवक्ता मेजर जनरल विनथाई सुवारी ने बताया कि कंथारलक जिले के जंगलों में सोमवार को गश्त कर रहे चार थाई सैनिक अचानक विस्फोट की चपेट में आ गए। एक सैनिक ने अपना पैर खो दिया, जबकि बाकी तीन घायल हो गए। थाई सेना ने जांच के बाद दावा किया कि यह धमाका हाल ही में बिछाई गई नई लैंडमाइन से हुआ। फोरेंसिक टीम ने घटनास्थल से तीन सक्रिय बारूदी सुरंगें और एक गहरा गड्ढा बरामद किया, जो विस्फोट की शक्ति का संकेत था।
इस घटना ने थाई सैन्य नेतृत्व को झकझोर दिया। थाई जनरल विनथाई ने बयान में कहा —
“कंबोडिया की यह हरकत शांति समझौते की भावना के खिलाफ है। यह हमारी सीमाओं पर शत्रुता बढ़ाने का प्रयास है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह घटना “दो देशों के बीच बने विश्वास की हत्या” के समान है।
कंबोडिया की सफाई: ‘यह पुरानी लैंडमाइन थी’
कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। कंबोडियाई प्रवक्ता ने कहा कि यह कोई नई लैंडमाइन नहीं थी, बल्कि गृहयुद्ध काल (1970-1990) के दौरान बिछाई गई बारूदी सुरंग थी, जो दशकों बाद फटी। उन्होंने आरोप लगाया कि थाईलैंड इस घटना का राजनीतिकरण कर रहा है और इसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रचारित कर क्षेत्रीय सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहा है।
कंबोडिया ने अपने बयान में कहा —
“हम किसी भी नई बारूदी सुरंग बिछाने से सख्ती से इनकार करते हैं। कंबोडिया ने जेनेवा कन्वेंशन और डोनाल्ड ट्रंप शांति समझौते का हमेशा सम्मान किया है। थाई सेना के आरोप झूठे और भड़काऊ हैं।”
ट्रंप शांति समझौते की कहानी
यह समझौता वर्ष 2020 में हुआ था, जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोनों देशों के बीच “Peace Line Accord” पर हस्ताक्षर करवाए थे। इस समझौते के तहत, दोनों पक्षों ने सीमा पर से सभी सक्रिय बारूदी सुरंगों को हटाने, भारी हथियारों को सीमित करने और युद्धबंदियों की अदला-बदली करने पर सहमति दी थी।
कई वर्षों तक यह समझौता सफल माना गया — सीमाई झड़पें बंद हो गईं और सीमा व्यापार में तेजी आई। लेकिन हालिया घटना ने इस “ट्रंप ट्रीटी” को सवालों के घेरे में ला दिया है। थाईलैंड ने इसे अब “स्थगित” कर दिया है, जिसका अर्थ है कि दोनों देशों के बीच सैन्य संवाद रुक गया है।
क्षेत्रीय शांति पर मंडराता संकट
विशेषज्ञों के अनुसार, यह विवाद केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। थाईलैंड और कंबोडिया की सीमा दक्षिण-पूर्व एशिया के व्यापार मार्ग का अहम हिस्सा है। यहां तनाव बढ़ने से वियतनाम, लाओस, और म्यांमार जैसे देशों की सुरक्षा नीतियों पर भी असर पड़ सकता है।
एशियन जियोपॉलिटिक्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में कहा गया है —
“यदि थाईलैंड ने सीमा पर अपनी सेना बढ़ाई, तो कंबोडिया जवाबी कदम उठाएगा, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन बिगड़ सकता है।
यह एशिया की शांति के लिए 2010 जैसी स्थिति दोहरा सकता है।”
थाईलैंड की रणनीति: ‘राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि’
थाईलैंड के रक्षा मंत्री जनरल सोमकिट पनुपोंग ने कहा कि उनका देश अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा।
उन्होंने कहा —
“हम युद्ध नहीं चाहते, लेकिन हमारी संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा।”
सूत्रों के अनुसार, थाई सेना ने सीमा क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिक तैनात कर दिए हैं और ड्रोन निगरानी बढ़ाई जा रही है। थाईलैंड ने संयुक्त राष्ट्र से भी इस मुद्दे पर हस्तक्षेप की मांग की है।
कंबोडिया का पलटवार: ‘राजनीतिक साजिश’ का आरोप
कंबोडिया ने थाईलैंड के इस कदम को “राजनीतिक स्टंट” बताया है। कंबोडियाई विदेश मंत्री ने कहा कि थाईलैंड में जल्द चुनाव होने वाले हैं और सरकार जनता का ध्यान भटकाने के लिए “सीमाई दुश्मनी” का कार्ड खेल रही है। उन्होंने कहा —
“थाई सरकार अपनी घरेलू नाकामियों को छिपाने के लिए युद्ध का माहौल बना रही है।
हमारी तरफ से कोई भी सैन्य कार्रवाई नहीं हुई है।”
जेनेवा कन्वेंशन और ट्रंप ट्रीटी का उल्लंघन
थाईलैंड का कहना है कि कंबोडिया का व्यवहार जेनेवा कन्वेंशन और ट्रंप शांति समझौते दोनों का उल्लंघन है। इन समझौतों में स्पष्ट कहा गया था कि कोई भी देश सीमा क्षेत्र में नई बारूदी सुरंग नहीं बिछाएगा और सभी पुरानी सुरंगों को हटाया जाएगा। थाई विशेषज्ञों ने दावा किया कि कंबोडिया की सेना ने “रक्षा अभ्यास” के नाम पर यह काम किया।
सैन्य विश्लेषकों की राय
सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजनैतिक प्रभाव का खेल भी है। थाईलैंड लंबे समय से अमेरिका के करीबी रहा है, जबकि कंबोडिया हाल के वर्षों में चीन के साथ अपने संबंध मजबूत कर चुका है। इस वजह से यह विवाद “चीन-अमेरिका प्रतिद्वंद्विता” का नया मंच बन सकता है।
इतिहास गवाह है – सीमा विवाद पुराना है
थाईलैंड और कंबोडिया का सीमा विवाद नया नहीं है। 1962 में प्रेह विहार मंदिर को लेकर दोनों देशों में संघर्ष हुआ था। 2011 में भी गोलाबारी के चलते दोनों देशों के दर्जनों सैनिक मारे गए थे। हर बार अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से समझौते हुए, लेकिन विश्वास की कमी बनी रही। यह हालिया बारूदी सुरंग विवाद उसी अविश्वास का विस्तार है।
क्या शांति की कोई उम्मीद है?
संयुक्त राष्ट्र महासचिव के प्रवक्ता ने दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की है। ASEAN (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन) ने भी आपात बैठक बुलाई है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर दोनों देश अपनी राजनीतिक जिद छोड़ दें, तो बातचीत के ज़रिए समाधान संभव है। लेकिन फिलहाल हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं।
