भारत में पहचान की क्रांति के रूप में शुरू हुआ आधार कार्ड प्रोजेक्ट अब एक नया सवाल खड़ा कर रहा है—क्या हमारे सिस्टम में मृतक भी “जिंदा” हैं? यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (UIDAI) की हालिया रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि देश में करीब 6 करोड़ ऐसे आधार कार्ड धारक हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है, लेकिन उनके कार्ड अब भी सक्रिय हैं।
ये खुलासा न केवल पहचान प्रणाली की गंभीर कमियों को उजागर करता है बल्कि यह भी दिखाता है कि सरकारी योजनाओं में फर्जीवाड़ा और वित्तीय धोखाधड़ी कितनी गहराई तक पैठ बना चुकी है।

15 साल पुराना सिस्टम, लेकिन अधूरी सफाई
जनवरी 2009 में आधार की शुरुआत “हर नागरिक की एक यूनिक पहचान” के नारे के साथ हुई थी। 15 साल बीत चुके हैं और अब तक 142 करोड़ से अधिक आधार नंबर जारी हो चुके हैं। लेकिन UIDAI के अनुसार, लगभग 8 करोड़ धारकों की मृत्यु हो चुकी है। इसके बावजूद केवल 1.83 करोड़ कार्ड ही निष्क्रिय किए जा सके हैं।
इसका सीधा अर्थ है कि करीब 6 करोड़ मृतकों के आधार कार्ड अभी भी सक्रिय हैं, और उनका उपयोग बैंक खातों, राशन कार्ड, पेंशन योजनाओं और बीमा क्लेम में किया जा रहा है।
पश्चिम बंगाल बना सबसे बड़ा उदाहरण
UIDAI की रिपोर्ट बताती है कि केवल पश्चिम बंगाल में लगभग 34 लाख आधार कार्ड धारकों की मृत्यु हो चुकी है, लेकिन उनके कार्ड आज भी सिस्टम में “जिंदा” हैं। इससे फर्जी खातों, बैंक फ्रॉड और सरकारी लाभ योजनाओं में हेरफेर की आशंकाएं और गहरी हो गई हैं।
UIDAI के CEO भुवनेश कुमार के अनुसार, भारत के महापंजीयक (RGI) से अब तक 1.55 करोड़ मृतकों का डेटा प्राप्त हुआ है। नवंबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच ही 38 लाख नए मृतकों की सूची इसमें जुड़ी है।
UIDAI का प्रयास: “मृत्यु सूचना पोर्टल”
जनवरी 2025 में UIDAI ने एक नया “Death Notification Portal” लॉन्च किया। इसका उद्देश्य था — मृतक के परिजनों को ऑनलाइन आधार निष्क्रिय कराने की सुविधा देना।
हालांकि अब तक सिर्फ 3,000 लोगों ने ही इस पोर्टल पर जानकारी दर्ज कराई, और उनमें से केवल 500 मामलों की ही पुष्टि हो सकी। यानी, आम नागरिक अभी तक इस प्रक्रिया से अनजान हैं या फिर यह सुविधा व्यावहारिक रूप से सुगम नहीं बन पाई है।
मृत्यु का पंजीकरण: अभी भी “कैजुअल”
UIDAI प्रमुख भुवनेश कुमार ने स्वीकार किया कि भारत में मृत्यु का पंजीकरण अब भी बेहद लापरवाह तरीके से होता है। कई राज्यों में आंकड़े अधूरे हैं, जबकि कुछ राज्यों से डेटा आता ही नहीं।
2010 के समय देश में हर साल करीब 56 लाख मौतें दर्ज होती थीं। अब यह संख्या बढ़कर 85 लाख प्रतिवर्ष तक पहुँच चुकी है। UIDAI के अनुमान के अनुसार, 2016 से अब तक लगभग 8 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई होगी, परंतु आधिकारिक रिकॉर्ड इतने नहीं बताते।
48 लाख नामों का मिलान नहीं, 80 “मृतक” जिंदा निकले!
सर्वे में लगभग 48 लाख रिकॉर्ड का मिलान नहीं हो सका। इनमें से 4-5% रिकॉर्ड ऐसे थे, जिनमें नाम क्षेत्रीय भाषा या वर्तनी के कारण मैच नहीं हो पाए।
हैरानी की बात यह है कि 80 ऐसे मामले सामने आए जहां जिन लोगों को “मृत” माना गया था, वे बाद में जीवित पाए गए। UIDAI इन मामलों की गहन जांच कर रहा है।
100 वर्ष पार करने वाले 8.3 लाख आधार कार्ड
UIDAI के डेटा में 8.3 लाख ऐसे आधार धारक दर्ज हैं जिनकी उम्र 100 वर्ष से अधिक दिखाई दे रही है। इनमें सर्वाधिक महाराष्ट्र (74,000), उत्तर प्रदेश (67,000), आंध्र प्रदेश (64,000) और तेलंगाना (62,000) शामिल हैं।
राज्य सरकारों ने अब तक केवल 3,086 मामलों की ही पुष्टि की है — जिनमें 629 जीवित, 783 मृत और 1,674 का कोई अता-पता नहीं मिला। यह स्थिति दिखाती है कि डेटा अपडेट और सत्यापन में गंभीर कमियां हैं।
बैंक, राशन और पेंशन में फर्जीवाड़े के संकेत
UIDAI की रिपोर्ट ने न केवल पहचान प्रणाली की कमियों को उजागर किया है, बल्कि वित्तीय संस्थानों और योजनाओं की डेटा सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किए हैं।
- SBI के 22 करोड़ आधार लिंक्ड खातों में से 8 लाख मृतकों के खाते बंद किए गए।
- PNB के 14 करोड़ खातों में से 4 लाख धारकों की मृत्यु की पुष्टि हुई।
- PDS (राशन प्रणाली) में जुड़े 80 करोड़ कार्डों में से 4.5 लाख मृतक लाभार्थी पाए गए।
- 2 करोड़ पेंशनरों में से 22 लाख की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है।
- बीमा कंपनियों के पास भी 5 लाख मृतकों की जानकारी पाई गई है।
“आधार” — सुविधा या खतरा?
आधार कार्ड ने जहां एक ओर सरकारी सेवाओं को डिजिटल और तेज़ बनाया है, वहीं दूसरी ओर यह डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के खतरे भी लेकर आया है। यदि मृतकों के कार्ड सक्रिय रहते हैं, तो फर्जी ट्रांजैक्शन, डुप्लिकेट पहचान और घोटाले का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
UIDAI की चुनौतियां
UIDAI के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां हैं:
- मृत्यु रजिस्ट्रेशन सिस्टम को सेंट्रलाइज करना – ताकि हर राज्य का डेटा स्वचालित रूप से UIDAI तक पहुंचे।
- परिजनों को जागरूक करना – ताकि वे मृतक का आधार समय पर निष्क्रिय कराएं।
- डेटा सिंक्रोनाइज़ेशन और क्षेत्रीय भाषा समस्या का समाधान – जिससे डुप्लिकेट या गलत मिलान न हो।
आगे की दिशा
UIDAI का लक्ष्य है कि दिसंबर 2025 तक कम से कम 2 करोड़ मृतकों के आधार कार्ड निष्क्रिय किए जा सकें। इसके लिए संगठन राज्य सरकारों, बैंकों, बीमा कंपनियों और जनगणना विभागों के साथ डेटा इंटीग्रेशन कर रहा है।
साथ ही, UIDAI एक AI आधारित वेरिफिकेशन सिस्टम पर भी काम कर रहा है, जो आधार डेटाबेस में उम्र, मृत्यु रिकॉर्ड और उपयोग के पैटर्न के आधार पर स्वतः डिटेक्शन करेगा।
डिजिटल युग में संवेदनशील जिम्मेदारी
आधार भारत की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली है। यह न केवल एक पहचान पत्र है, बल्कि हर व्यक्ति के बैंक, बीमा, राशन, टैक्स, वोटर और मोबाइल सिस्टम से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की त्रुटि का अर्थ है — व्यक्ति, समाज और सिस्टम — तीनों पर असर।
इसलिए UIDAI को न केवल तकनीकी सुधार की दिशा में बल्कि मानव-संवेदनशील दृष्टिकोण से भी आगे बढ़ना होगा, ताकि पहचान की यह सबसे बड़ी प्रणाली भरोसेमंद बनी रहे।
निष्कर्ष
आधार की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि तकनीक तभी सार्थक है जब मानवता उससे जुड़ी हो।
यदि मृतक व्यक्ति भी सिस्टम में जिंदा दिखाई दे रहा है, तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारे डेटा प्रबंधन और जिम्मेदारी के तंत्र की कमी का संकेत है।
UIDAI के प्रयास जारी हैं, पर असली बदलाव तब होगा जब जनता, सरकार और तकनीक – तीनों एक साथ जिम्मेदारी से जुड़ें।
