दुनिया की राजनीति में जब कोई बड़ा और अप्रत्याशित कदम उठाया जाता है, तो उसका असर सिर्फ उस देश तक सीमित नहीं रहता। हाल ही में अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में किए गए ऑपरेशन ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा, जहां सत्ता परिवर्तन के बाद वहां के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर अमेरिका लाया गया। इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इसी तरह का कोई कदम रूस भी यूक्रेन में उठा सकता है। क्या रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ वही कर सकते हैं, जो अमेरिका ने वेनेजुएला में किया?

यह सवाल जितना सीधा दिखता है, उतना ही जटिल भी है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि वेनेजुएला और यूक्रेन की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का फर्क है। रूस के लिए यूक्रेन में ऐसा कोई अभियान चलाना बेहद कठिन ही नहीं, बल्कि लगभग असंभव माना जा रहा है।
ट्रंप का वेनेजुएला प्लान क्या था
वेनेजुएला में अमेरिका की कार्रवाई अचानक, तेज और निर्णायक मानी गई। वहां पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता थी, सत्ता संरचना कमजोर हो चुकी थी और सुरक्षा तंत्र में कई स्तरों पर सेंध लग चुकी थी। इसी स्थिति का फायदा उठाकर अमेरिका ने एक सीमित लेकिन प्रभावशाली ऑपरेशन को अंजाम दिया।
इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें न तो बड़े पैमाने पर जमीनी युद्ध हुआ और न ही लंबी सैन्य घुसपैठ। सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने में अमेरिका को अपेक्षाकृत कम प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
यही वजह है कि अब यह तुलना की जा रही है कि क्या रूस भी यूक्रेन में इसी तरह का “डिकैपिटेशन स्ट्राइक” यानी शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाने वाला अभियान चला सकता है।
यूक्रेन की स्थिति वेनेजुएला से पूरी तरह अलग
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन को वेनेजुएला के चश्मे से देखना एक बड़ी भूल होगी। यूक्रेन पिछले तीन वर्षों से युद्ध की स्थिति में है और इस दौरान उसकी सुरक्षा प्रणाली लगातार मजबूत हुई है।
जहां वेनेजुएला में सत्ता को लेकर असमंजस और आंतरिक मतभेद थे, वहीं यूक्रेन में सत्ता संरचना स्पष्ट, स्थिर और युद्धकालीन मोड में है। राष्ट्रपति जेलेंस्की न केवल देश के भीतर मजबूत समर्थन रखते हैं, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक मान्यता और सहयोग प्राप्त है।
कीव: एक अभेद्य राजधानी
यूक्रेन की राजधानी कीव आज दुनिया की सबसे अधिक सुरक्षित राजधानियों में गिनी जाती है। तीन साल से जारी युद्ध ने कीव को एक तरह से सैन्य किले में बदल दिया है। यहां सुरक्षा के कई स्तर हैं, जिनमें आधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम, सतत निगरानी, और चौबीसों घंटे सक्रिय खुफिया नेटवर्क शामिल हैं।
जेलेंस्की का निवास स्थान किसी सामान्य सरकारी भवन जैसा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे परिसर में स्थित है, जहां हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखी जाती है। पश्चिमी देशों से मिलने वाली रियल-टाइम खुफिया जानकारी की वजह से किसी भी संदिग्ध गतिविधि का तुरंत पता चल जाता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि रूसी सेना के लिए कीव में घुसपैठ करना ही बेहद कठिन है, राष्ट्रपति तक पहुंचना तो और भी असंभव है।
पश्चिमी देशों का अभूतपूर्व समर्थन
यूक्रेन को जिस स्तर का अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है, वह वेनेजुएला के मामले में देखने को नहीं मिला। अमेरिका, यूरोप और नाटो से जुड़े कई देश यूक्रेन को सैन्य, आर्थिक और खुफिया सहायता दे रहे हैं।
रूस की हर बड़ी सैन्य गतिविधि पर पश्चिमी देशों की पैनी नजर रहती है। सैटेलाइट इमेजरी, साइबर इंटेलिजेंस और जमीनी नेटवर्क के जरिए यूक्रेन को लगातार सूचनाएं मिलती रहती हैं।
इस वैश्विक समर्थन के चलते रूस के लिए कोई भी अचानक और गुप्त ऑपरेशन चलाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
राजनीतिक शून्यता का अभाव
वेनेजुएला में एक बड़ा कारण यह था कि वहां सत्ता को लेकर स्पष्टता नहीं थी। जनता के बीच असंतोष, संस्थानों की कमजोरी और राजनीतिक विभाजन ने हालात को और बिगाड़ दिया था।
इसके उलट यूक्रेन में राजनीतिक शून्यता नहीं है। युद्ध के बावजूद सरकार काम कर रही है, सेना संगठित है और प्रशासनिक ढांचा सक्रिय है। जेलेंस्की युद्धकालीन नेता के रूप में उभरे हैं और उनकी छवि केवल एक राष्ट्रपति की नहीं, बल्कि प्रतिरोध के प्रतीक की बन चुकी है।
ऐसे में किसी भी बाहरी ताकत के लिए सत्ता को अचानक गिरा देना बेहद कठिन हो जाता है।
रूस की सीमाएं और थकान
तीन साल से चल रहे युद्ध ने रूसी सेना पर भी भारी दबाव डाला है। सैन्य संसाधन, आर्थिक प्रतिबंध और अंतरराष्ट्रीय अलगाव ने रूस की क्षमता को सीमित किया है।
विश्लेषकों का कहना है कि रूस पहले ही यूक्रेन में बड़े पैमाने पर फंसा हुआ है। ऐसे में किसी नए, जोखिम भरे और उच्च स्तरीय ऑपरेशन को अंजाम देना रूस के लिए रणनीतिक आत्मघात जैसा हो सकता है।
इसके अलावा, किसी भी असफल प्रयास का राजनीतिक और सैन्य नुकसान रूस को वैश्विक मंच पर और कमजोर कर सकता है।
जेलेंस्की की सुरक्षा रणनीति
यूक्रेनी राष्ट्रपति की सुरक्षा केवल सैन्य बलों तक सीमित नहीं है। उनकी लोकेशन को लेकर बेहद सख्त गोपनीयता बरती जाती है। वे नियमित रूप से अपनी जगह बदलते रहते हैं और उनकी सार्वजनिक गतिविधियों की जानकारी सीमित रखी जाती है।
यह रणनीति उन्हें किसी भी संभावित हमले से सुरक्षित रखने में मदद करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस के लिए जेलेंस्की की सटीक लोकेशन तक पहुंचना ही एक बड़ी चुनौती है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और प्रतिक्रिया का डर
अगर रूस यूक्रेन में किसी तरह का ऐसा कदम उठाता है, तो इसका अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गंभीर परिणाम होंगे। वेनेजुएला और यूक्रेन की स्थिति कानूनी रूप से भी अलग है।
यूक्रेन एक संप्रभु राष्ट्र है, जिसे संयुक्त राष्ट्र और अधिकांश वैश्विक शक्तियों की मान्यता प्राप्त है। वहां के राष्ट्रपति को निशाना बनाना रूस के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी प्रतिक्रिया को न्योता देगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रतिक्रिया केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि और भी कड़े प्रतिबंधों और संभावित सैन्य टकराव के रूप में सामने आ सकती है।
क्या रूस के पास कोई विकल्प है
हालांकि रूस के लिए ट्रंप जैसा प्लान अपनाना बेहद कठिन है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रूस के पास कोई रणनीति नहीं है। रूस अन्य तरीकों से दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है, जैसे राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना, साइबर हमले या ऊर्जा और अर्थव्यवस्था से जुड़े कदम।
लेकिन सीधे तौर पर जेलेंस्की को पकड़ने या सत्ता के शीर्ष को अचानक हटाने का प्रयास रूस के लिए अत्यधिक जोखिम भरा माना जा रहा है।
निष्कर्ष
वेनेजुएला में अमेरिका की कार्रवाई और यूक्रेन में रूस की स्थिति की तुलना करना सतही तौर पर भले ही आकर्षक लगे, लेकिन वास्तविकता में दोनों हालात बिल्कुल अलग हैं। यूक्रेन की मजबूत सुरक्षा, वैश्विक समर्थन, राजनीतिक स्थिरता और युद्धकालीन तैयारियों के कारण रूस के लिए ऐसा कोई कदम उठाना लगभग असंभव है।
विशेषज्ञों की राय में, पुतिन के लिए यूक्रेन में ट्रंप का “वेनेजुएला प्लान” दोहराना न केवल मुश्किल है, बल्कि यह रूस को और बड़े संकट में भी डाल सकता है।
