मुख्य बातें
- जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर 12 अक्टूबर से प्रदर्शन जारी है।
- चार छात्र भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनकी मांगों में छात्र संघ की बहाली, निलंबन और प्रवेश प्रतिबंध के फैसले वापस लेना तथा प्रॉक्टर का इस्तीफा शामिल है।
- विश्वविद्यालय प्रशासन ने 18 अक्टूबर को छात्रों की मांगों पर बातचीत और परिसर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए सात सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति बनाने की घोषणा की।
- जामिया में छात्र संघ के चुनाव दिसंबर 2005 में हुए थे। 31 मार्च 2006 को छात्र संघ कार्यालय सील किए जाने के बाद से चुनाव नहीं हुए हैं।

जामिया छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है। विश्वविद्यालय परिसर में 12 अक्टूबर से प्रदर्शन कर रहे छात्र चाहते हैं कि छात्र संघ के चुनाव दोबारा शुरू हों, निलंबित विद्यार्थियों और परिसर में प्रवेश पर रोक से जुड़े फैसले वापस लिए जाएं तथा विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर इस्तीफा दें। आंदोलन के दौरान चार छात्र भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। छात्रों के मुताबिक, उनका संघर्ष केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की आवाज को औपचारिक प्रतिनिधित्व देने का भी सवाल है।
विवाद के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने 18 अक्टूबर को हुई बैठक के बाद सात सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति बनाने की घोषणा की। प्रशासन के अनुसार, समिति प्रदर्शन कर रहे छात्रों की मांगों पर चर्चा करेगी, उनका परीक्षण करेगी और परिसर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए आवश्यक कदम सुझाएगी। यह घोषणा आंदोलन के बीच बातचीत की संभावित शुरुआत है, लेकिन उपलब्ध जानकारी में छात्रों की मांगों को स्वीकार करने या छात्र संघ चुनाव कराने की कोई अंतिम घोषणा नहीं की गई है।
जामिया का यह आंदोलन इसलिए भी ध्यान खींच रहा है क्योंकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लगभग आठ साल बाद छात्र संघ चुनाव कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। वहां छात्रों के प्रदर्शन और करीब 20 दिनों तक चली भूख हड़ताल के बाद प्रशासन ने चुनाव की घोषणा की थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, एएमयू में मतदान 5 नवंबर को होना है। जामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि एएमयू का घटनाक्रम उन्हें अपनी मांग को लेकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
चार छात्र भूख हड़ताल पर क्यों बैठे
जामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग पर प्रदर्शन 12 अक्टूबर से विश्वविद्यालय के गेट नंबर 7 के अंदर जारी है। आंदोलन की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के छात्र जासिम खान और बीए एलएलबी के विद्यार्थी एबिन बासिल भूख हड़ताल पर बैठे। चार दिन बाद सामाजिक कार्य विषय के परास्नातक छात्र रेहान हैदर और बीए ऑनर्स भूगोल के छात्र रेहान खान भी अनशन में शामिल हो गए। इस तरह भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों की संख्या चार हो गई।
प्रदर्शन के दौरान 17 अक्टूबर की सुबह तड़के विश्वविद्यालय के सुरक्षा कर्मचारियों ने कथित तौर पर आंदोलन कर रहे छात्रों को परिसर से बाहर कर दिया और कैंपस बंद कर दिया गया। छात्रों के अनुसार, इसके बाद बड़ी संख्या में विद्यार्थी वहां पहुंचे और जबरन परिसर में दाखिल हुए। इसके बाद प्रदर्शन फिर शुरू हो गया। इस घटनाक्रम के बाद आंदोलन का मुद्दा छात्र संघ की बहाली के साथ-साथ छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई और परिसर में विरोध करने के अधिकार से भी जुड़ गया।
भूख हड़ताल जैसे विरोध का तरीका छात्रों के लिए अपनी मांगों की गंभीरता दिखाने का माध्यम है, लेकिन इससे उनके स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता पैदा होती है। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उनकी मांग के बावजूद मेडिकल सुविधा की व्यवस्था नहीं की और छात्रों ने खुद ही स्वास्थ्य जांच का इंतजाम किया। यह आरोप छात्रों की ओर से लगाया गया है; उपलब्ध जानकारी में विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से इस विशेष आरोप का अलग से विस्तृत जवाब दर्ज नहीं है।
छात्रों की तीन प्रमुख मांगें
भूख हड़ताल पर बैठे जासिम खान ने अपनी मांगों को तीन बिंदुओं में रखा। पहली मांग जामिया छात्र संघ की बहाली और उसके चुनाव कराने की है। दूसरी मांग उन विद्यार्थियों के निलंबन तथा परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़े फैसलों को वापस लेने की है, जिन पर आंदोलन के दौरान कार्रवाई हुई है। तीसरी मांग विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर के इस्तीफे की है। छात्रों का आरोप है कि शांतिपूर्ण तरीके से बैठे विद्यार्थियों के खिलाफ कार्रवाई कराई गई।
इन मांगों में छात्र प्रतिनिधित्व का सवाल सबसे व्यापक है। छात्र संघ होने पर विद्यार्थियों को अपनी समस्याएं सामूहिक रूप से उठाने, विश्वविद्यालय प्रशासन से संवाद करने और छात्र समुदाय की प्राथमिकताओं को सामने रखने के लिए एक निर्वाचित मंच मिल सकता है। प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों का तर्क है कि अभी उन्हें अलग-अलग मामलों में प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और उनके पास ऐसा प्रतिनिधि नहीं है जो सामूहिक रूप से उनकी बात रख सके।
एबिन बासिल ने बताया कि प्रदर्शन के कारण उन्हें एक साल के लिए विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों को परिसर से बाहर निकाले जाने के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की गई और प्रशासन की ओर से उनसे बातचीत करने के लिए कोई नहीं आया। इन आरोपों और कार्रवाई के आधार को समझने के लिए विश्वविद्यालय का आधिकारिक पक्ष तथा संबंधित आदेश देखना जरूरी होगा। उपलब्ध विवरण में प्रशासन ने समिति गठित करने की बात कही है, लेकिन प्रत्येक छात्र पर की गई कार्रवाई के बारे में अलग-अलग निर्णय का विवरण नहीं दिया गया है।
प्रशासन ने बनाई सात सदस्यीय समिति
विश्वविद्यालय प्रशासन ने 18 अक्टूबर को कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ, रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिज़वी, विभिन्न संकायों के डीन, छात्र कल्याण अधिष्ठाता, मुख्य प्रॉक्टर, छात्रावास के प्रोवोस्ट और अन्य अधिकारियों की बैठक के बाद समिति गठित करने की घोषणा की। विश्वविद्यालय की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, समिति छात्रों की मांगों पर चर्चा करेगी, उनका परीक्षण करेगी और परिसर में शांति बहाल करने के लिए जरूरी कदम उठाएगी।
इस घोषणा से संकेत मिलता है कि प्रशासन ने आंदोलन को लेकर संस्थागत स्तर पर बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया है। हालांकि, समिति का गठन और मांगों को स्वीकार करना दो अलग बातें हैं। अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि छात्र संघ के चुनाव कब होंगे, निलंबन के आदेश वापस लिए जाएंगे या प्रॉक्टर इस्तीफा देंगे। इन मुद्दों पर समिति की समीक्षा और प्रशासन के अगले फैसले महत्वपूर्ण होंगे।
छात्रों की शिकायत रही है कि आंदोलन के दौरान उनसे बातचीत करने के लिए प्रशासन की ओर से कोई नहीं आया। समिति की घोषणा के बाद अगला अहम प्रश्न यह होगा कि विद्यार्थियों के प्रतिनिधियों से औपचारिक बैठक कब होती है, उनकी मांगों पर क्या जवाब दिया जाता है और बातचीत के लिए कोई समयसीमा तय की जाती है या नहीं। यदि संवाद की प्रक्रिया स्पष्ट होती है, तो इससे तनाव कम करने में मदद मिल सकती है; लेकिन मांगों पर असहमति बनी रहने पर आंदोलन जारी रहने की संभावना भी रहेगी।
जामिया में छात्र संघ का इतिहास
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ के चुनाव लंबे समय से नहीं हुए हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 1996 के बाद दिसंबर 2005 में छात्र संघ के चुनाव कराए गए थे। उस समय विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीरुल हसन ने चुनाव कराने की अनुमति दी थी। शम्स परवेज़ उस चुनाव में छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए थे। हालांकि, यह व्यवस्था ज्यादा समय तक जारी नहीं रही।
31 मार्च 2006 को जामिया छात्र संघ के कार्यालय को सील कर दिया गया। उसके बाद से विश्वविद्यालय में छात्र संघ के चुनाव नहीं हो सके। विश्वविद्यालय ने उस समय कार्यालय सील किए जाने की वजह छात्र संघ के नियमों से जुड़ी बताई थी और कहा था कि 31 मार्च के बाद संघ का कार्यकाल समाप्त हो गया था। दूसरी ओर, पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष शम्स परवेज़ ने अपने बयान में आरोप लगाया कि चुनाव के बाद नियुक्तियों और नौकरियों में कथित भ्रष्टाचार पर रोक लगने से प्रशासन के कुछ लोग परेशान थे।
यहां दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है। विश्वविद्यालय का तत्कालीन स्पष्टीकरण नियमों और कार्यकाल से जुड़ा था, जबकि पूर्व अध्यक्ष ने इसके पीछे प्रशासनिक हितों को लेकर आरोप लगाए। उपलब्ध जानकारी इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करती। इसलिए छात्र संघ कार्यालय सील किए जाने के कारण को एक ही व्याख्या में समेटना उचित नहीं होगा। इतना स्पष्ट है कि 2005 के चुनाव के बाद नियमित छात्र संघ चुनाव बहाल नहीं हो पाए और यही स्थिति आज के आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बनी हुई है।
छात्र प्रतिनिधित्व की जरूरत क्यों उठ रही है
जामिया में छात्र संघ नहीं है, लेकिन विभागों के स्तर पर प्रतिनिधियों के चुनाव होते हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, प्रत्येक कक्षा में दो क्लास प्रतिनिधि होते हैं—एक निर्वाचित और दूसरा कक्षा का टॉपर। इसके बाद विभागीय स्तर पर उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव चुने जाते हैं। विभागीय समिति का अध्यक्ष संबंधित विभाग का प्रमुख होता है। हालांकि, विश्वविद्यालय स्तर पर छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव नहीं होता।
प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि विभागीय प्रतिनिधित्व और विश्वविद्यालय स्तर के छात्र संघ में अंतर है। उनके अनुसार, हॉस्टल, भोजन, अनुशासनात्मक नोटिस और दूसरे प्रशासनिक मामलों में विद्यार्थियों की समस्याओं को सामूहिक रूप से उठाने के लिए एक मजबूत मंच जरूरी है। जासिम खान ने दावा किया कि छात्रों को कई मामलों में कारण बताओ नोटिस मिलते हैं और उनके पास ऐसा निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है जो इन मुद्दों को प्रशासन के सामने प्रभावी तरीके से रख सके।
छात्रा अलका हसन ने भी छात्र संघ को आवश्यक बताते हुए कहा कि विद्यार्थियों को काम कराने के लिए विभिन्न कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं। उनके मुताबिक, यदि निर्वाचित प्रतिनिधि हों, तो समस्याओं को एक जगह संगठित तरीके से उठाया जा सकता है। इन बयानों से छात्रों की मांग का एक व्यावहारिक पक्ष सामने आता है—वे चाहते हैं कि विश्वविद्यालय में निर्णय लेने वाली व्यवस्था और विद्यार्थी समुदाय के बीच नियमित संवाद का माध्यम हो।
हालांकि, छात्र संघ की बहाली से हर समस्या अपने आप हल हो जाएगी, यह मान लेना भी सही नहीं होगा। किसी भी निर्वाचित निकाय की प्रभावशीलता उसके अधिकारों, चुनावी प्रक्रिया, प्रशासन के साथ संवाद और जवाबदेही पर निर्भर करती है। यदि चुनाव होते हैं, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि छात्र प्रतिनिधियों की भूमिका और अधिकार किस तरह तय किए जाते हैं और शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी बनती है।
2017 की भूख हड़ताल और अदालत का मामला
जामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग पहली बार नहीं उठी है। सितंबर 2017 में छात्र मीरान हैदर ने छात्र संघ चुनाव कराने की मांग को लेकर दस दिनों तक भूख हड़ताल की थी। नौवें दिन उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और बाद में उन्होंने अनशन समाप्त कर दिया। उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने अदालत में मामला लंबित होने का हवाला देते हुए छात्र संघ बहाल करने से इनकार किया था।
इस विवाद की कानूनी पृष्ठभूमि में 2012 में दायर याचिका भी शामिल है। छात्र हामिदुर रहमान ने दिल्ली हाई कोर्ट में छात्र संघ के चुनाव कराने की मांग की थी। 20 दिसंबर 2022 को अदालत ने हामिदुर रहमान बनाम जामिया मिल्लिया इस्लामिया मामले में जनहित याचिका का निपटारा कर दिया। सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय के वकील ने अदालत को बताया था कि छात्र संघ भंग कर दिया गया है और चुनाव कराने का सवाल नहीं उठता।
हालिया आंदोलन के संदर्भ में विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी अदालत के 2022 के मामले का हवाला देते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने छात्र संघ को उत्पादक नहीं पाया था और विश्वविद्यालय को चुनाव कराने का निर्देश नहीं दिया था। इस कथन का सटीक कानूनी अर्थ समझने के लिए अदालत का मूल आदेश पढ़ना जरूरी है। यह कहना सही नहीं होगा कि अदालत ने चुनाव कराने पर अनिवार्य रोक लगा दी थी, क्योंकि उपलब्ध विवरण में प्रशासन का कहना है कि अदालत ने चुनाव कराने का निर्देश नहीं दिया था।
इसलिए वर्तमान विवाद में दो प्रश्न अलग-अलग हैं: एक, अदालत के आदेश और विश्वविद्यालय के नियम छात्र संघ की बहाली के बारे में क्या कहते हैं; दूसरा, विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी नीतियों के तहत छात्र संघ चुनाव कराने का निर्णय ले सकता है या नहीं। इनका उत्तर मूल न्यायिक आदेश, विश्वविद्यालय के नियमों और प्रशासन के आधिकारिक स्पष्टीकरण को साथ रखकर ही निकाला जा सकता है।
एएमयू चुनाव से जामिया आंदोलन को प्रेरणा
जामिया के प्रदर्शन के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव की प्रक्रिया भी चर्चा में है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, एएमयू में लगभग आठ साल बाद चुनाव होने जा रहे हैं। वहां छात्रों के प्रदर्शन और करीब 20 दिनों तक चली भूख हड़ताल के बाद प्रशासन ने चुनाव कराने का निर्णय लिया और मतदान की तारीख 5 नवंबर बताई गई है।
जामिया के प्रदर्शनकारी छात्रों ने एएमयू की घटनाओं को अपने आंदोलन के लिए प्रेरणा बताया है। उनके लिए यह उदाहरण है कि लंबे समय से बंद चुनावी व्यवस्था की बहाली की मांग लगातार उठाने पर प्रशासन निर्णय ले सकता है। हालांकि, दोनों विश्वविद्यालयों के नियम, प्रशासनिक परिस्थितियां और कानूनी स्थिति अलग हो सकती हैं। इसलिए एएमयू में चुनाव की घोषणा को जामिया में भी चुनाव तत्काल होने की गारंटी नहीं माना जा सकता।
फिर भी, दोनों परिसरों में छात्र प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही बहस विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक भागीदारी के व्यापक सवाल को सामने लाती है। छात्रों के लिए चुनाव केवल पदाधिकारियों को चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि शिकायतों को सामूहिक रूप से रखने और प्रशासन के साथ नियमित संवाद स्थापित करने का माध्यम भी हो सकता है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालयों को चुनावी प्रक्रिया के नियम, अनुशासन और शैक्षणिक गतिविधियों को सुचारु रखने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है।
जेएनयू में भी जारी है छात्र आंदोलन
इसी अवधि में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी छात्र प्रदर्शन और भूख हड़ताल जारी होने की जानकारी दी गई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, वहां आंदोलनरत छात्र मुख्य प्रॉक्टर कार्यालय की नियमावली वापस लेने, छात्र संघ के पदाधिकारियों का निष्कासन रद्द करने, जीएसकैश व्यवस्था को प्रभावी बनाने और प्रवेश परीक्षा बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
जेएनयू के छात्र प्रतिनिधि गुलाम वारिस ने कहा कि वे दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा चाहते हैं, क्योंकि उनके अनुसार इससे दूर-दराज के और वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को लाभ मिलता था। उन्होंने शिक्षा के केंद्रीकरण पर भी आपत्ति जताई। यह जेएनयू के आंदोलनकारियों का पक्ष है; उपलब्ध विवरण में इन मांगों पर प्रशासन का पूरा जवाब शामिल नहीं है।
जामिया और जेएनयू के आंदोलनों की मांगें एक जैसी नहीं हैं। जामिया में मौजूदा प्रदर्शन का केंद्रीय मुद्दा छात्र संघ की बहाली और प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई है, जबकि जेएनयू में प्रवेश प्रक्रिया, अनुशासनात्मक नियम और छात्र संघ के पदाधिकारियों से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। फिर भी, दोनों मामलों में छात्र प्रशासनिक निर्णयों में अपनी भागीदारी और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय परिसरों में छात्रों और प्रशासन के बीच संवाद की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। किसी आंदोलन का समाधान केवल सुरक्षा व्यवस्था या अनुशासनात्मक कार्रवाई से नहीं निकलता; शिकायतों को सुनने, नियमों को स्पष्ट करने और विवादों पर निष्पक्ष विचार करने की व्यवस्था भी जरूरी होती है।
आगे क्या होगा
जामिया के आंदोलन में अब सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम सात सदस्यीय समिति की भूमिका होगी। प्रशासन ने कहा है कि समिति छात्रों की मांगों पर चर्चा करेगी और उनका परीक्षण करेगी। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि समिति छात्रों से कब मिलेगी, अपनी रिपोर्ट कब देगी या उसकी सिफारिशों पर क्या कार्रवाई होगी। इन सवालों के जवाब से यह तय करने में मदद मिलेगी कि बातचीत के जरिए विवाद कम हो सकता है या नहीं।
छात्रों की तीन मांगें भी अलग-अलग प्रकृति की हैं। छात्र संघ की बहाली के लिए चुनावी नियमों और विश्वविद्यालय की नीति पर निर्णय आवश्यक होगा। निलंबन तथा प्रवेश प्रतिबंध हटाने के मामलों में संबंधित आदेशों और कार्रवाई के आधार की समीक्षा करनी होगी। प्रॉक्टर के इस्तीफे की मांग प्रशासनिक जिम्मेदारी और छात्रों के आरोपों से जुड़ी है। संभव है कि समिति प्रत्येक विषय को अलग तरीके से देखे, लेकिन उपलब्ध घोषणा में किसी विशेष मांग पर निर्णय का विवरण नहीं है।
भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों की स्वास्थ्य स्थिति भी अहम चिंता है। छात्रों ने मेडिकल सुविधा को लेकर शिकायत की है। यदि अनशन जारी रहता है, तो स्वास्थ्य जांच और आपातकालीन सहायता की उपलब्धता महत्वपूर्ण होगी। विश्वविद्यालय प्रशासन की समिति को बातचीत के साथ-साथ परिसर में सामान्य स्थिति बहाल करने की जिम्मेदारी भी दी गई है, लेकिन छात्रों की मांगों पर ठोस जवाब के बिना प्रदर्शन खत्म होगा या नहीं, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है।
जामिया छात्र संघ की बहाली का सवाल अब केवल पुरानी चुनावी व्यवस्था की वापसी तक सीमित नहीं है। इसमें छात्रों की भागीदारी, प्रशासनिक जवाबदेही, अनुशासनात्मक कार्रवाई की पारदर्शिता और शिकायतों के समाधान का प्रश्न भी शामिल है। विश्वविद्यालय की समिति, छात्रों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत और प्रशासन के अगले निर्णय इस विवाद की दिशा तय करेंगे। फिलहाल, आंदोलन जारी है और चुनाव बहाली की मांग पर कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है।
FAQ
1. जामिया छात्र संघ की बहाली के लिए प्रदर्शन कर रहे छात्रों की मुख्य मांगें क्या हैं?
जामिया के प्रदर्शनकारियों की तीन प्रमुख मांगें हैं। पहली, विश्वविद्यालय में छात्र संघ की बहाली और चुनाव कराना। दूसरी, आंदोलन से जुड़े जिन छात्रों को निलंबित किया गया है या जिनके परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया है, उन फैसलों को वापस लेना। तीसरी, विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर का इस्तीफा। प्रशासन ने इन मांगों पर विचार के लिए सात सदस्यीय समिति बनाई है।
2. जामिया में चार छात्र भूख हड़ताल पर क्यों बैठे हैं?
छात्र संघ चुनाव बहाल कराने की मांग को लेकर जासिम खान और एबिन बासिल ने आंदोलन के पहले दिन से भूख हड़ताल शुरू की थी। चार दिन बाद रेहान हैदर और रेहान खान भी इसमें शामिल हो गए। छात्र संघ की बहाली के अलावा वे अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेने और प्रॉक्टर के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
3. जामिया प्रशासन ने छात्रों के आंदोलन पर क्या कदम उठाया है?
विश्वविद्यालय प्रशासन ने 18 अक्टूबर को बैठक के बाद सात सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित करने की घोषणा की। समिति छात्रों से बातचीत करेगी, उनकी मांगों की जांच करेगी और परिसर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए जरूरी कदम सुझाएगी। उपलब्ध जानकारी में समिति की रिपोर्ट की समयसीमा या छात्र संघ चुनाव कराने का अंतिम निर्णय घोषित नहीं किया गया है।
4. जामिया में आखिरी बार छात्र संघ चुनाव कब हुए थे?
उपलब्ध विवरण के अनुसार, जामिया में दिसंबर 2005 में छात्र संघ के चुनाव हुए थे। इससे पहले 1996 के बाद चुनाव नहीं हुए थे। 31 मार्च 2006 को छात्र संघ कार्यालय सील कर दिया गया और उसके बाद चुनाव नहीं कराए गए। विश्वविद्यालय ने उस समय नियमों और संघ के कार्यकाल का हवाला दिया था, जबकि पूर्व अध्यक्ष ने अलग आरोप लगाए थे।
5. क्या दिल्ली हाई कोर्ट ने जामिया में छात्र संघ चुनाव पर रोक लगाई थी?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट ने 20 दिसंबर 2022 को छात्र संघ चुनाव से जुड़ी एक जनहित याचिका का निपटारा किया था। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि अदालत ने चुनाव कराने का निर्देश नहीं दिया। इसे चुनाव पर स्पष्ट प्रतिबंध मानने से पहले अदालत के मूल आदेश और विश्वविद्यालय के संबंधित नियमों को पढ़ना जरूरी है।
6. जामिया में छात्र संघ नहीं होने पर विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व कैसे होता है?
जामिया में विभागीय स्तर पर प्रतिनिधियों के चुनाव होते हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, हर कक्षा में एक निर्वाचित प्रतिनिधि और एक टॉपर प्रतिनिधि होता है। विभागों में उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव भी चुने जाते हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि यह व्यवस्था विश्वविद्यालय स्तर पर छात्र संघ की जगह नहीं लेती और व्यापक समस्याओं को उठाने के लिए एक केंद्रीय प्रतिनिधि मंच जरूरी है।
7. एएमयू के छात्र संघ चुनाव का जामिया आंदोलन से क्या संबंध है?
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लगभग आठ साल बाद छात्र संघ चुनाव होने की जानकारी सामने आई है। वहां छात्रों के प्रदर्शन और करीब 20 दिनों की भूख हड़ताल के बाद चुनाव की घोषणा हुई। जामिया के प्रदर्शनकारी इसे अपनी मांग के लिए प्रेरणा बताते हैं। हालांकि, दोनों विश्वविद्यालयों के नियम और प्रशासनिक परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए एएमयू में चुनाव होने से जामिया में चुनाव की गारंटी नहीं मिलती।
8. जामिया आंदोलन का अगला महत्वपूर्ण घटनाक्रम क्या होगा?
सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम सात सदस्यीय समिति की बैठक, छात्रों से बातचीत और उनकी मांगों पर प्रशासन का जवाब होगा। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि समिति कब रिपोर्ट देगी या चुनाव कराने पर कोई समयसीमा तय होगी। छात्रों के निलंबन, परिसर में प्रवेश प्रतिबंध और प्रॉक्टर के इस्तीफे की मांग पर भी आगे की कार्रवाई देखनी होगी।







