मुख्य बातें
- जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना 22 नवंबर 1920 को अलीगढ़ में हुई थी।
- आर्थिक संकट के दौरान महात्मा गांधी ने संस्थान को बचाने के लिए आर्थिक मदद जुटाने का भरोसा दिया था।
- 1925 में हकीम अजमल खान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा के प्रयासों से जामिया दिल्ली के करोल बाग पहुंचा।
- 1935 में संस्थान को ओखला स्थानांतरित किया गया। 1988 में संसद के कानून से इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला।

दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी इन दिनों छात्र संघ चुनाव और प्रदर्शन को लेकर चर्चा में है, लेकिन इस संस्थान की पहचान केवल मौजूदा घटनाक्रम तक सीमित नहीं है। इसकी स्थापना ब्रिटिश शासन के दौर में अलीगढ़ में हुई थी। आर्थिक संकट, स्वतंत्रता आंदोलन और कई प्रमुख शिक्षाविदों के प्रयासों से गुजरते हुए यह विश्वविद्यालय दिल्ली पहुंचा। इसके शुरुआती दिनों में महात्मा गांधी ने भी इसकी निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
जामिया का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था के विकास से जुड़ा है। यह उन संस्थानों में शामिल रहा, जिनकी स्थापना औपनिवेशिक शासन के दौर में शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना को साथ लेकर चलने के उद्देश्य से की गई थी।
अलीगढ़ में रखी गई थी नींव
जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना 22 नवंबर 1920 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुई थी। उस दौर में देश में असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन का प्रभाव था। अंग्रेजी शासन की शिक्षा व्यवस्था के विकल्प के रूप में राष्ट्रीय विचारों और स्वायत्त शैक्षणिक संस्थानों को विकसित करने की कोशिशें चल रही थीं।
इसी पृष्ठभूमि में जामिया की शुरुआत हुई। इसकी आधारशिला स्वतंत्रता सेनानी मौलाना महमूद हसन ने रखी थी। संस्थान के पहले चांसलर हकीम अजमल खान बने, जबकि मोहम्मद अली जौहर को पहला वाइस चांसलर नियुक्त किया गया। महात्मा गांधी भी इसकी स्थापना और विकास से जुड़े प्रमुख समर्थकों में शामिल थे।
नाम के अर्थ में भी इसकी मूल सोच दिखाई देती है। उर्दू में ‘जामिया’ का अर्थ विश्वविद्यालय और ‘मिल्लिया’ का अर्थ राष्ट्रीय होता है। यानी यह नाम शिक्षा को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने की भावना को व्यक्त करता है।
आंदोलन कमजोर हुए तो आर्थिक संकट आया
जामिया की शुरुआत जिस राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में हुई थी, उसी पर उसकी आर्थिक निर्भरता भी थी। असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन के दौरान संस्थान को सहयोग मिलता रहा, लेकिन 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने और 1924 में खिलाफत आंदोलन के समाप्त होने के बाद आर्थिक सहायता प्रभावित हुई।
इसका सीधा असर जामिया के संचालन पर पड़ा। संस्थान के सामने वित्तीय संसाधनों की कमी और अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी हो गई। उस समय यह केवल एक शैक्षणिक संस्था को चलाए रखने का सवाल नहीं था, बल्कि उस वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था को कायम रखने की कोशिश भी थी, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों से प्रेरणा मिली थी।
गांधी ने भीख मांगने की बात कही
जामिया के शुरुआती संकट के दौरान महात्मा गांधी ने इसके संचालन को जारी रखने के लिए आर्थिक मदद जुटाने की पहल की। जामिया के इतिहास से जुड़े विवरणों में गांधी के उस कथन का उल्लेख मिलता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि संस्थान को चलाने के लिए धन की कमी है तो वह कटोरा लेकर भीख मांगने को तैयार हैं।
यह कथन उस समय जामिया के प्रति गांधी की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उनका संदेश था कि आर्थिक कठिनाइयों के कारण इस संस्थान को बंद नहीं होने देना चाहिए। हालांकि, केवल गांधी के प्रयासों से समस्या हल नहीं हुई। जामिया से जुड़े लोगों ने भी आर्थिक सहयोग जुटाने के लिए अलग-अलग स्थानों का दौरा किया और सामूहिक प्रयास किए।
1925 में अलीगढ़ से दिल्ली आया जामिया
आर्थिक संकट के बीच जामिया को नई जगह ले जाने का फैसला हुआ। 1925 में हकीम अजमल खान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा के प्रयासों से संस्थान अलीगढ़ से दिल्ली के करोल बाग में स्थानांतरित किया गया। इस प्रक्रिया में महात्मा गांधी का सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा।
दिल्ली पहुंचने के बाद जामिया के पुनर्गठन और शैक्षणिक गतिविधियों को मजबूत करने का काम शुरू हुआ। डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. आबिद हुसैन और डॉ. मोहम्मद मुजीब जैसे शिक्षाविदों ने संस्थान के विकास में अहम भूमिका निभाई। डॉ. जाकिर हुसैन के नेतृत्व में शिक्षा को अधिक व्यापक और व्यावहारिक बनाने पर जोर दिया गया।
प्रौढ़ शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण पर जोर
जामिया के पुनर्निर्माण के दौर में शाम की कक्षाओं के माध्यम से प्रौढ़ शिक्षा की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य उन लोगों तक शिक्षा पहुंचाना था, जिन्हें नियमित शैक्षणिक व्यवस्था में पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता था।
शिक्षक प्रशिक्षण भी संस्थान की प्रमुख गतिविधियों में शामिल हुआ। देश के अलग-अलग हिस्सों से शिक्षक यहां प्रशिक्षण लेने आते थे। इस तरह जामिया ने सामान्य उच्च शिक्षा के साथ शिक्षक तैयार करने और वयस्क शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम किया।
ओखला में बना आज का परिसर
करोल बाग में कुछ वर्षों तक संचालित होने के बाद 1935 में जामिया से जुड़े संस्थानों और शैक्षणिक कार्यक्रमों को दिल्ली के बाहरी क्षेत्र ओखला में स्थानांतरित कर दिया गया। चार साल बाद, 1939 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया को एक संस्था के रूप में पंजीकृत किया गया।
देश की आजादी और विभाजन के दौर में भी संस्थान ने अपनी शैक्षणिक गतिविधियां जारी रखीं। जामिया की आधिकारिक ऐतिहासिक जानकारी में महात्मा गांधी की उस टिप्पणी का उल्लेख मिलता है, जिसमें उन्होंने विभाजन के बाद सांप्रदायिक तनाव के माहौल में जामिया परिसर को शांति और सौहार्द का स्थान बताया था।
केंद्रीय विश्वविद्यालय तक का सफर
स्वतंत्रता के बाद जामिया का शैक्षणिक विस्तार जारी रहा। वर्ष 1962 में इसे मानित विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया। इसके बाद दिसंबर 1988 में संसद द्वारा विशेष कानून पारित किए जाने के बाद यह केंद्रीय विश्वविद्यालय बना।
आज जामिया मिल्लिया इस्लामिया में स्नातक, स्नातकोत्तर, शोध, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र स्तर के अनेक पाठ्यक्रम संचालित होते हैं। विश्वविद्यालय की पहचान शिक्षा, शोध और विभिन्न अकादमिक क्षेत्रों में इसकी गतिविधियों से बनी है।
छात्र संघ विवाद के बीच फिर चर्चा में संस्थान
जामिया का ऐतिहासिक सफर ऐसे समय फिर चर्चा में है, जब छात्र संघ की बहाली और चुनाव की तारीख घोषित करने की मांग को लेकर परिसर में प्रदर्शन चल रहा है। उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, विश्वविद्यालय में 2006 के बाद छात्र संघ का चुनाव नहीं हुआ है। छात्रों ने 12 अक्टूबर 2026 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी।
26 अक्टूबर को प्रशासन ने कहा था कि छात्र संघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराए जाएंगे। प्रशासन ने प्रदर्शन के दौरान जारी निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लेने तथा सुरक्षाकर्मियों के व्यवहार की जांच के लिए समिति बनाने की बात भी कही। छात्रों की आपत्ति यह है कि संविधान को मंजूरी देने की समय-सीमा स्पष्ट नहीं की गई है, इसलिए चुनाव की निश्चित तारीख अब भी सामने नहीं आई।
इसके बाद 28 अक्टूबर को जारी बयान में विश्वविद्यालय प्रशासन ने 27 अक्टूबर की रात परिसर में तोड़फोड़ और सुरक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए। प्रशासन के मुताबिक, गेट नंबर 4C, सीसीटीवी नियंत्रण कक्ष और कैमरों को नुकसान पहुंचाया गया। ये प्रशासन के आरोप हैं; उपलब्ध जानकारी में इन घटनाओं की स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष सामने नहीं हैं।
अलीगढ़ में एक छोटे शैक्षणिक संस्थान के रूप में शुरू हुआ जामिया आज केंद्रीय विश्वविद्यालय है। इसका इतिहास बताता है कि संस्थान का विकास केवल स्थान बदलने की कहानी नहीं, बल्कि आर्थिक संकट, शिक्षा के नए प्रयोगों और सामूहिक प्रयासों से जुड़ी लंबी यात्रा रहा है।
FAQ’s
1. जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना कब और कहां हुई थी?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना 22 नवंबर 1920 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुई थी। इसकी शुरुआत औपनिवेशिक शासन के दौर में राष्ट्रीय शिक्षा और स्वतंत्र शैक्षणिक व्यवस्था को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी।
2. जामिया मिल्लिया इस्लामिया को दिल्ली कौन लेकर आया था?
वर्ष 1925 में हकीम अजमल खान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख्वाजा के प्रयासों से जामिया को अलीगढ़ से दिल्ली के करोल बाग स्थानांतरित किया गया। महात्मा गांधी ने भी इस प्रक्रिया में सहयोग दिया था।
3. महात्मा गांधी ने जामिया के लिए भीख मांगने की बात क्यों कही थी?
असहयोग और खिलाफत आंदोलनों के कमजोर पड़ने के बाद जामिया को मिलने वाली आर्थिक सहायता प्रभावित हुई थी। संस्थान के संचालन पर संकट आया तो गांधी ने इसके लिए धन जुटाने की प्रतिबद्धता जताई थी। उनके कथन का आशय था कि आर्थिक कठिनाई के कारण जामिया बंद नहीं होना चाहिए।
4. जामिया मिल्लिया इस्लामिया ओखला कब पहुंचा था?
वर्ष 1935 में जामिया से जुड़े संस्थानों और शैक्षणिक कार्यक्रमों को दिल्ली के ओखला क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद 1939 में इसे एक संस्था के रूप में पंजीकृत किया गया। आज इसका प्रमुख परिसर इसी क्षेत्र में स्थित है।
5. जामिया मिल्लिया इस्लामिया को केंद्रीय विश्वविद्यालय कब बनाया गया?
जामिया को 1962 में मानित विश्वविद्यालय का दर्जा मिला था। दिसंबर 1988 में संसद द्वारा विशेष कानून पारित किए जाने के बाद इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ।
6. जामिया में छात्र संघ चुनाव को लेकर विवाद क्या है?
उपलब्ध समाचार विवरण के मुताबिक, विश्वविद्यालय में 2006 के बाद छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं। छात्र संगठन की बहाली और चुनाव की निश्चित तारीख घोषित करने की मांग कर रहे हैं। प्रशासन ने संविधान की मंजूरी के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराने की बात कही है, लेकिन छात्र संविधान को मंजूरी देने की समय-सीमा स्पष्ट नहीं होने से असंतुष्ट हैं।







