भारतीय शेयर बाजार में तकनीक की भूमिका बीते कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग, एल्गोरिदमिक सिस्टम और ऑटोमेटेड ऑर्डर प्लेसमेंट ने बाजार की गति को पहले से कहीं अधिक तेज बना दिया है। इसी तेज रफ्तार के बीच ऑर्डर मैसेज की संख्या में भी असाधारण वृद्धि हुई है। इस स्थिति को संतुलित और व्यवस्थित करने के लिए स्टॉक एक्सचेंज बीएसई ने इक्विटी कैश सेगमेंट में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने रखा है, जो 1 जनवरी 2026 से लागू किया जाना प्रस्तावित है।

क्या है नया प्रस्ताव
नए फ्रेमवर्क के तहत इक्विटी कैश सेगमेंट में हर ब्रोकर को रोजाना ब्रोकर-लेवल पर 10 करोड़ ऑर्डर मैसेज तक की सुविधा मुफ्त दी जाएगी। इस सीमा के भीतर भेजे गए ऑर्डर मैसेज पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा। लेकिन जैसे ही कोई ब्रोकर इस निर्धारित सीमा को पार करेगा, उसके बाद भेजे गए हर अतिरिक्त ऑर्डर मैसेज पर शुल्क वसूला जाएगा। यह बदलाव बाजार की संरचना और ट्रेडिंग व्यवहार पर दूरगामी असर डाल सकता है।
ऑर्डर मैसेज का अर्थ और महत्व
ऑर्डर मैसेज वे इलेक्ट्रॉनिक संदेश होते हैं जो ब्रोकर या उनका ट्रेडिंग सिस्टम एक्सचेंज को भेजता है। जब कोई नया ऑर्डर डाला जाता है, मौजूदा ऑर्डर में संशोधन किया जाता है या किसी ऑर्डर को रद्द किया जाता है, तो हर बार एक अलग ऑर्डर मैसेज जेनरेट होता है। आधुनिक ट्रेडिंग सिस्टम में, खासकर एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग के दौरान, एक ही सेकंड में लाखों ऑर्डर मैसेज भेजे जा सकते हैं।
क्यों जरूरी महसूस हुआ यह बदलाव
बीएसई के अनुसार, इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य ब्रोकर-लेवल पर संतुलित और कुशल ऑर्डर फ्लो मैनेजमेंट को बढ़ावा देना है। अत्यधिक ऑर्डर मैसेज एक्सचेंज की तकनीकी क्षमता पर दबाव डालते हैं और कभी-कभी सिस्टम की स्थिरता को भी प्रभावित कर सकते हैं। नए नियम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि केवल वास्तविक और आवश्यक ऑर्डर ही भेजे जाएं, न कि सिस्टम को अनावश्यक संदेशों से भर दिया जाए।
चार्ज स्ट्रक्चर कैसे होगा लागू
यदि कोई ब्रोकर रोजाना 10 करोड़ ऑर्डर मैसेज की सीमा पार करता है, तो उसके बाद हर अतिरिक्त ऑर्डर मैसेज पर 0.0025 रुपये का शुल्क लगेगा। इसका अर्थ यह है कि यदि सीमा के बाद 10 लाख अतिरिक्त ऑर्डर मैसेज भेजे जाते हैं, तो उस पर कुल 2.50 रुपये का चार्ज बनेगा। देखने में यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन बड़े और हाई वॉल्यूम ट्रेडिंग करने वाले ब्रोकर्स के लिए यह कुल मिलाकर एक महत्वपूर्ण लागत बन सकती है।
किन ऑर्डर मैसेज को गिना जाएगा
इक्विटी कैश सेगमेंट में किसी भी ब्रोकर द्वारा भेजे गए सभी प्रकार के ऑर्डर मैसेज इस गिनती में शामिल होंगे। इसमें नए ऑर्डर जोड़ना, मौजूदा ऑर्डर में बदलाव करना, ऑर्डर को डिलीट करना और ऑड-लॉट ऑर्डर से जुड़े संदेश भी शामिल हैं। हालांकि सेटलमेंट ऑक्शन से जुड़े ऑर्डर मैसेज को इस गणना से बाहर रखा गया है, जिससे कुछ हद तक राहत मिलती है।
महीने में पहली बार सीमा पार करने पर राहत
बीएसई ने ब्रोकर्स को राहत देने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रावधान भी रखा है। हर कैलेंडर महीने में यदि कोई ब्रोकर पहली बार ऑर्डर मैसेज की सीमा पार करता है, तो उस पहली घटना पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। लेकिन यदि उसी महीने में दूसरी बार फिर से सीमा टूटती है, तो उसके बाद चार्ज लागू हो जाएगा। इससे ब्रोकर्स को अपने सिस्टम को एडजस्ट करने और ऑर्डर फ्लो को समझने का समय मिलेगा।
जनवरी 2026 में चार्ज नहीं
इस पूरे फ्रेमवर्क को लागू करने से पहले एक ट्रांजिशन पीरियड भी रखा गया है। 1 जनवरी से 31 जनवरी 2026 तक के पहले महीने में किसी भी ब्रोकर से कोई चार्ज नहीं वसूला जाएगा, भले ही वह सीमा पार कर जाए। वास्तविक शुल्क फरवरी 2026 से प्रस्तावित नियमों के अनुसार लागू होंगे। यह कदम ब्रोकर्स को नए सिस्टम के साथ तालमेल बिठाने का अवसर देगा।
डेटा शेयरिंग और पारदर्शिता
बीएसई 1 जनवरी 2026 से ब्रोकर्स के साथ डेली फाइल्स साझा करना शुरू करेगा। इन फाइल्स में हर ब्रोकर द्वारा भेजे गए कुल ऑर्डर मैसेज की संख्या का विवरण होगा। 15 जनवरी 2026 से इन फाइल्स में लागू होने वाले चार्ज की जानकारी भी शामिल की जाएगी, लेकिन केवल तभी जब किसी ब्रोकर ने निर्धारित सीमा का उल्लंघन किया हो। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और ब्रोकर्स को अपने ट्रेडिंग पैटर्न का विश्लेषण करने में मदद मिलेगी।
बिलिंग और भुगतान प्रक्रिया
ऑर्डर मैसेज पर लगने वाले चार्ज रोजाना के आधार पर जमा किए जाएंगे और उन्हें नियमित मासिक बिलिंग साइकिल के जरिए वसूला जाएगा। इसका मतलब यह है कि ब्रोकर्स को अलग से रोज भुगतान करने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि यह शुल्क उनके मासिक बिल में समायोजित हो जाएगा।
छोटे और बड़े ब्रोकर्स पर असर
इस प्रस्ताव का प्रभाव छोटे और बड़े ब्रोकर्स पर अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है। छोटे ब्रोकर्स, जिनका ऑर्डर वॉल्यूम सीमित रहता है, शायद ही कभी 10 करोड़ की सीमा तक पहुंचें। वहीं बड़े ब्रोकर्स और हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग करने वाले संस्थानों को अपने सिस्टम और रणनीतियों में बदलाव करना पड़ सकता है ताकि अनावश्यक ऑर्डर मैसेज कम किए जा सकें।
एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग पर प्रभाव
एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग में बड़ी संख्या में ऑर्डर मैसेज भेजे जाते हैं, जिनमें से कई ऑर्डर तुरंत कैंसिल या मॉडिफाई भी हो जाते हैं। नए नियमों के बाद ऐसे ट्रेडर्स को अपने एल्गोरिदम को और अधिक कुशल बनाना होगा। इससे बाजार में शोर कम हो सकता है और ऑर्डर बुक की गुणवत्ता में सुधार आने की संभावना है।
बाजार की स्थिरता और निवेशकों का भरोसा
बीएसई का मानना है कि यह कदम बाजार की तकनीकी स्थिरता को मजबूत करेगा। जब एक्सचेंज सिस्टम पर अनावश्यक दबाव कम होगा, तो ट्रेडिंग में रुकावटें घटेंगी और निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा। लंबी अवधि में यह पूरे पूंजी बाजार के लिए सकारात्मक माना जा रहा है।
भविष्य की दिशा
2026 से लागू होने वाला यह प्रस्ताव भारतीय शेयर बाजार में तकनीकी और नियामकीय संतुलन की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह न केवल एक्सचेंज की क्षमता को सुरक्षित रखेगा, बल्कि ब्रोकर्स को भी जिम्मेदार ट्रेडिंग व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित करेगा। आने वाले समय में यह देखा जाएगा कि यह नियम बाजार की तरलता और ट्रेडिंग वॉल्यूम को किस हद तक प्रभावित करता है।
