मुख्य बातें
- भाजपा विधायक भगवानदास सबनानी ने दिशा समिति की बैठक में भोपाल स्मार्ट सिटी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
- करोड़ों रुपये की कई परियोजनाओं में रखरखाव, उपयोगिता और योजना निर्माण को लेकर कमियां सामने आईं।
- आवासीय टावरों की लिफ्ट बंद, सार्वजनिक साइकिल परियोजना ठप और कई विकास कार्य अधूरे मिले।
- स्मार्ट सिटी प्रबंधन का कहना है कि कई परियोजनाओं में सुधार और नई एजेंसियों के चयन की प्रक्रिया जारी है।

भोपाल स्मार्ट सिटी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। लगभग एक दशक पहले जिस मिशन को राजधानी को आधुनिक, तकनीकी रूप से सक्षम और नागरिक सुविधाओं से लैस शहर बनाने की उम्मीदों के साथ शुरू किया गया था, उसकी कई परियोजनाओं पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कुछ योजनाएं अधूरी हैं, कुछ रखरखाव के अभाव में बदहाल हो चुकी हैं, जबकि कुछ परियोजनाएं अपने मूल उद्देश्य को ही पूरा नहीं कर पा रही हैं।
हाल ही में जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति (दिशा) की बैठक में भाजपा विधायक भगवानदास सबनानी ने स्मार्ट सिटी परियोजनाओं की स्थिति पर खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि शहर के विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर काम तो हुए, लेकिन नागरिकों को अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिल सकीं। उनके बयान के बाद राजधानी में स्मार्ट सिटी मिशन की प्रगति और उसकी उपयोगिता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
दस वर्षों में हजार करोड़ से अधिक का निवेश
साल 2016 में केंद्र सरकार के स्मार्ट सिटी मिशन के तहत भोपाल का चयन हुआ था। योजना का उद्देश्य केवल नई सड़कें बनाना नहीं था, बल्कि शहरी जीवन को अधिक सुरक्षित, सुविधाजनक और टिकाऊ बनाना भी था। टीटी नगर क्षेत्र के लगभग 342 एकड़ हिस्से को एरिया बेस्ड डेवलपमेंट (ABD) के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया।
इस क्षेत्र में आधुनिक आवास, चौड़ी सड़कें, भूमिगत सुविधाएं, साइकिल ट्रैक, हरित क्षेत्र, डिजिटल निगरानी, स्मार्ट पार्किंग, ऊर्जा दक्षता और बेहतर जल प्रबंधन जैसी अनेक परियोजनाएं शामिल की गईं। इसके अलावा पूरे शहर में सूचना प्रौद्योगिकी आधारित सेवाओं, स्मार्ट पोल, निगरानी प्रणाली और नागरिक सेवाओं पर भी भारी निवेश किया गया।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार परियोजनाओं पर हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। खर्च के मामले में भोपाल देश के अग्रणी स्मार्ट शहरों में गिना जाता है, लेकिन अब सवाल खर्च से अधिक परिणामों पर उठ रहे हैं।
भोपाल स्मार्ट सिटी आवासीय टावरों की चुनौती
स्मार्ट सिटी क्षेत्र में सरकारी कर्मचारियों के लिए बहुमंजिला आधुनिक आवासीय परिसर तैयार किए गए। पहले चरण में तीन 13 मंजिला टावर बनाए गए, जिनमें कुल 364 फ्लैट हैं। इनके निर्माण पर लगभग 116 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसी परिसर में अतिरिक्त टावरों का निर्माण भी जारी है।
परियोजना के उद्घाटन के समय दावा किया गया था कि इन भवनों में आधुनिक शहरी जीवन की सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध रहेंगी। प्रत्येक टावर में दो लिफ्ट, अग्निशमन व्यवस्था, सुरक्षा प्रणाली, डोर कैमरा, पार्क, बच्चों के खेल क्षेत्र और अन्य मूलभूत सुविधाएं विकसित की गईं।
लेकिन वास्तविक स्थिति अलग दिखाई दे रही है। कई स्थानों पर लिफ्ट बंद होने की शिकायतें सामने आई हैं। रहवासियों का कहना है कि तकनीकी खराबी होने के बाद समय पर मरम्मत नहीं हो पाती। सबसे बड़ी समस्या यह बताई जा रही है कि रखरखाव की जिम्मेदारी किस विभाग के पास होगी, इसे लेकर स्पष्ट व्यवस्था नहीं बन सकी।
दिशा समिति की बैठक में भी यही मुद्दा प्रमुखता से उठा। बैठक में संबंधित विभागों के अधिकारियों के बीच जिम्मेदारी तय करने को लेकर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।
मेंटेनेंस की कमी बनी बड़ी चुनौती
शहरी विकास विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी स्मार्ट परियोजना की सफलता केवल निर्माण पूरा होने से तय नहीं होती। उसकी वास्तविक परीक्षा तब होती है जब परियोजना नियमित रूप से संचालित हो, उसका रखरखाव समय पर हो और नागरिकों को लगातार सुविधाएं मिलती रहें।
यदि करोड़ों रुपये खर्च कर आधुनिक भवन बनाए जाएं लेकिन कुछ ही समय बाद लिफ्ट, सुरक्षा उपकरण या अन्य सेवाएं बंद होने लगें तो पूरी परियोजना की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
भोपाल में भी यही सवाल सामने आ रहा है कि निर्माण के बाद संचालन और रखरखाव की दीर्घकालिक योजना कितनी प्रभावी रही।
हाट बाजार परियोजना पर भी उठे सवाल
स्मार्ट सिटी क्षेत्र में लगभग 48 करोड़ रुपये की लागत से बहुमंजिला हाट बाजार परिसर तैयार किया गया। यहां सैकड़ों दुकानों का निर्माण किया गया ताकि छोटे व्यापारियों और स्थानीय कारोबार को व्यवस्थित स्थान मिल सके।
हालांकि इस परियोजना की योजना को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि व्यापारिक परिसर बनाते समय पार्किंग, सार्वजनिक सुविधाएं और ग्राहकों की आवाजाही जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
तीसरी मंजिल तक बनी दुकानों की उपयोगिता को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं। व्यापारियों का तर्क है कि यदि ग्राहक आसानी से ऊपरी मंजिल तक नहीं पहुंचेंगे तो वहां व्यापार प्रभावित होगा।
दूसरी ओर वर्षों पहले वैकल्पिक दुकानों का इंतजार कर रहे कई व्यापारी आज भी स्थायी आवंटन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका कहना है कि पूर्व में उन्हें नई दुकानों का आश्वासन दिया गया था, लेकिन प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो सकी।
योजना और क्रियान्वयन के बीच बढ़ती दूरी
शहरी विकास परियोजनाओं में अक्सर सबसे बड़ी चुनौती योजना और उसके वास्तविक उपयोग के बीच दिखाई देती है। कागज पर तैयार मॉडल आधुनिक और आकर्षक दिखाई देते हैं, लेकिन यदि स्थानीय जरूरतों, यातायात, व्यापारिक व्यवहार और नागरिक सुविधाओं का समुचित अध्ययन न किया जाए तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
भोपाल स्मार्ट सिटी की कुछ परियोजनाओं को लेकर भी विशेषज्ञ इसी पहलू की ओर संकेत कर रहे हैं। उनका मानना है कि भविष्य की परियोजनाओं में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अधिक व्यावहारिक योजना बनाना आवश्यक होगा।
अधूरा दशहरा मैदान बना चिंता का विषय
भोपाल स्मार्ट सिटी के तहत टीटी नगर स्थित ऐतिहासिक दशहरा मैदान को आधुनिक स्वरूप देने की योजना बनाई गई थी। इस परियोजना पर लगभग 31 करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं। उद्देश्य था कि मैदान को ऐसे बहुउद्देश्यीय सार्वजनिक स्थल के रूप में विकसित किया जाए, जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनियां, मेले और बड़े सार्वजनिक आयोजन बेहतर सुविधाओं के साथ आयोजित हो सकें।
हालांकि कई वर्षों बाद भी यह परियोजना पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी है। निर्माण कार्य की धीमी गति के कारण मैदान का बड़ा हिस्सा अधूरा पड़ा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से अधूरी पड़ी संरचनाओं के कारण क्षेत्र की सुंदरता प्रभावित हुई है और कुछ स्थानों पर असामाजिक गतिविधियों की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
बैठक के दौरान इस मुद्दे पर भी सवाल उठाए गए। अधिकारियों ने बताया कि निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए कई बार निविदा प्रक्रिया अपनाई गई और वर्तमान में भी कुछ कार्य प्रक्रियाधीन हैं। लेकिन लगातार देरी ने परियोजना की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
खाली पड़े कमर्शियल प्लॉट भी चुनौती
स्मार्ट सिटी परियोजना के आर्थिक मॉडल में एक महत्वपूर्ण हिस्सा व्यावसायिक भूखंडों की बिक्री से जुड़ा था। योजना के अनुसार विकसित किए गए प्लॉटों की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग अन्य विकास कार्यों में किया जाना था।
जानकारी के अनुसार स्मार्ट सिटी क्षेत्र में कुल 42 व्यावसायिक प्लॉट विकसित किए गए, लेकिन इनमें से केवल सीमित संख्या में ही बिक्री हो सकी। कई बड़े भूखंड अब भी खाली पड़े हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े आकार के प्लॉट होने के कारण छोटे और मध्यम निवेशकों की पहुंच इन तक नहीं बन सकी। यदि इन्हें छोटे आकार में विकसित किया जाता तो स्थानीय व्यापारियों, अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों या अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अधिक अवसर बन सकते थे।
दूसरी ओर अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र को भविष्य में बड़े कॉरपोरेट और संस्थागत निवेश के अनुरूप विकसित करने की रणनीति अपनाई गई थी। साथ ही नियामकीय प्रक्रियाओं और अनुमतियों में देरी का भी असर बिक्री पर पड़ा।
भोपाल स्मार्ट सिटी की साइकिल परियोजना क्यों रुकी
स्मार्ट और पर्यावरण अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 2018 में सार्वजनिक साइकिल साझा प्रणाली शुरू की गई थी। इस योजना के तहत लगभग 5.36 करोड़ रुपये खर्च कर 500 साइकिलें खरीदी गईं और शहर के प्रमुख मार्गों पर साइकिल ट्रैक विकसित किए गए।
शुरुआती दिनों में इस पहल को अच्छी प्रतिक्रिया मिली, लेकिन समय के साथ संचालन संबंधी समस्याएं सामने आने लगीं। रखरखाव, संचालन और उपयोगकर्ताओं की घटती संख्या के कारण परियोजना धीरे-धीरे ठप हो गई।
आज स्थिति यह है कि अधिकांश साइकिलें उपयोग से बाहर हैं और कई स्थानों पर साइकिल ट्रैक भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।
शहरी परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सार्वजनिक साइकिल परियोजना की सफलता केवल साइकिल उपलब्ध कराने से नहीं होती। इसके लिए सुरक्षित ट्रैक, नियमित रखरखाव, मोबाइल आधारित आसान बुकिंग, पर्याप्त स्टेशन और नागरिकों में उपयोग की संस्कृति विकसित करना भी आवश्यक होता है।
बताया जा रहा है कि अब इस परियोजना को नए स्वरूप में फिर से शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
सदर मंजिल बना सफल उदाहरण
जहां कई परियोजनाओं पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं कुछ कार्य अपेक्षाकृत सफल भी माने जा रहे हैं।
पुरानी विरासत इमारत सदर मंजिल का संरक्षण और पुनर्विकास इसी श्रेणी में आता है। लगभग 17 करोड़ रुपये की लागत से इसके संरक्षण का कार्य किया गया। इसके बाद भवन के संचालन के लिए निजी भागीदारी मॉडल अपनाया गया।
इस व्यवस्था से भवन का संरक्षण भी जारी है और सरकार को नियमित राजस्व मिलने की संभावना भी बनी हुई है। विशेषज्ञ इसे सार्वजनिक परिसंपत्तियों के बेहतर उपयोग का एक सकारात्मक उदाहरण मानते हैं।
स्मार्ट डस्टबिन परियोजना उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी
शहर में आधुनिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से भूमिगत स्मार्ट डस्टबिन लगाए गए थे। इस योजना पर लगभग पांच करोड़ रुपये खर्च किए गए।
परिकल्पना यह थी कि डस्टबिन तकनीकी सुविधाओं से लैस होंगे और स्वच्छता व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाएंगे। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
कचरे के पृथक्करण की समस्या, तकनीकी दिक्कतें और संचालन संबंधी चुनौतियों के कारण यह परियोजना पूरी क्षमता से काम नहीं कर सकी। बाद में स्वच्छता संबंधी दिशा-निर्देशों में बदलाव के बाद इनका उपयोग और सीमित हो गया।
हरियाली पर भी उठे सवाल
स्मार्ट सिटी परियोजना के दौरान बड़ी संख्या में पुराने सरकारी आवास हटाए गए और नए निर्माण कार्य किए गए। इस प्रक्रिया में हजारों पेड़ों के हटने का मुद्दा भी समय-समय पर चर्चा में रहा।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी आधुनिक शहर के लिए अनिवार्य है।
हालांकि बाद में कई स्थानों पर पौधारोपण अभियान चलाए गए, लेकिन पुराने विकसित वृक्षों की भरपाई अल्पकाल में संभव नहीं मानी जाती।
अटल पथ पर जल निकासी चिंता का कारण
स्मार्ट सड़कों को आधुनिक शहरी विकास का प्रतीक माना जाता है। लेकिन कुछ स्थानों पर जल निकासी व्यवस्था को लेकर सवाल उठे हैं।
बारिश के दौरान सड़कों पर पानी भरने और कुछ हिस्सों में सड़क क्षतिग्रस्त होने की शिकायतें सामने आई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क निर्माण के साथ प्रभावी ड्रेनेज प्रणाली विकसित करना भी उतना ही आवश्यक होता है।
यदि वर्षा जल का समुचित निकास न हो तो सड़कों की आयु कम होती है और रखरखाव पर अतिरिक्त खर्च बढ़ता है।
स्मार्ट पोल की अधूरी उपयोगिता
स्मार्ट सिटी मिशन के तहत लगाए गए स्मार्ट पोल केवल प्रकाश व्यवस्था तक सीमित रह गए हैं।
मूल योजना में इन पोल के माध्यम से सार्वजनिक वाई-फाई, इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग, डिजिटल सूचना प्रणाली, निगरानी और आपातकालीन संचार जैसी अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी थीं।
हालांकि वर्तमान में इनका अधिकांश उपयोग केवल स्ट्रीट लाइटिंग तक सीमित दिखाई देता है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि तकनीकी निवेश का पूरा लाभ नागरिकों तक क्यों नहीं पहुंच सका।
भविष्य की दिशा क्या होगी
भोपाल स्मार्ट सिटी की समीक्षा केवल कमियों की सूची नहीं है, बल्कि यह भविष्य के शहरी विकास के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी वर्षों में ध्यान केवल नई परियोजनाएं शुरू करने पर नहीं, बल्कि पहले से तैयार परिसंपत्तियों के प्रभावी संचालन, रखरखाव और नागरिक उपयोग बढ़ाने पर होना चाहिए।
साथ ही परियोजनाओं के लिए जवाबदेही तय करना, समयबद्ध रखरखाव, पारदर्शी निगरानी और नागरिक सहभागिता बढ़ाना भी आवश्यक होगा।
FAQ
1. भोपाल स्मार्ट सिटी परियोजना में सबसे बड़े मुद्दे कौन से सामने आए हैं?
हालिया समीक्षा और जनप्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए सवालों के अनुसार भोपाल स्मार्ट सिटी की कई परियोजनाओं में रखरखाव की कमी, अधूरे निर्माण, सार्वजनिक सुविधाओं के सीमित उपयोग और परियोजनाओं की उपयोगिता को लेकर सवाल उठे हैं। इनमें आवासीय टावर, सार्वजनिक साइकिल योजना, स्मार्ट पोल और दशहरा मैदान जैसी परियोजनाएं प्रमुख हैं।
2. आवासीय टावरों की लिफ्ट बंद होने का कारण क्या बताया जा रहा है?
बताया गया है कि टावरों के निर्माण के बाद नियमित रखरखाव और संचालन की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से तय नहीं हो सकी। इसी कारण तकनीकी खराबियों का समय पर समाधान नहीं हो पाया। संबंधित विभागों के बीच जिम्मेदारी तय करने का मुद्दा भी चर्चा में रहा।
3. भोपाल स्मार्ट सिटी की सार्वजनिक साइकिल परियोजना क्यों सफल नहीं हो सकी?
साइकिल साझा प्रणाली की शुरुआत पर्यावरण अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, लेकिन संचालन, रखरखाव, उपयोगकर्ताओं की संख्या में कमी और ट्रैक की खराब स्थिति जैसी चुनौतियों के कारण यह परियोजना अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। अब इसे नए मॉडल के साथ फिर शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
4. क्या स्मार्ट सिटी के सभी प्रोजेक्ट असफल रहे हैं?
नहीं। भोपाल स्मार्ट सिटी के अंतर्गत कुछ परियोजनाओं को सकारात्मक उदाहरण भी माना जा रहा है। विरासत भवनों के संरक्षण, कुछ सड़क विकास कार्यों और डिजिटल बुनियादी ढांचे के कई हिस्सों को सफल माना गया है। हालांकि कई परियोजनाओं में सुधार की आवश्यकता भी सामने आई है।
5. खाली पड़े कमर्शियल प्लॉटों का क्या होगा?
स्मार्ट सिटी प्रबंधन का कहना है कि इन भूखंडों को बड़े निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से विकसित किया गया था। भविष्य में मांग और निवेशकों की रुचि के अनुसार इनके उपयोग, बिक्री या विकास मॉडल में बदलाव पर निर्णय लिया जा सकता है।
6. स्मार्ट पोल से नागरिकों को कौन-कौन सी सुविधाएं मिलनी थीं?
योजना के अनुसार स्मार्ट पोल पर सार्वजनिक वाई-फाई, CCTV, सार्वजनिक सूचना प्रणाली, ई-व्हीकल चार्जिंग और अन्य डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराई जानी थीं। फिलहाल अधिकांश स्थानों पर इनका उपयोग मुख्य रूप से स्ट्रीट लाइटिंग तक सीमित बताया जा रहा है।
7. आगे भोपाल स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में क्या बदलाव संभव हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में रखरखाव व्यवस्था मजबूत करने, जवाबदेही तय करने, अधूरी परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और नागरिक उपयोग बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है। संबंधित विभागों द्वारा कई परियोजनाओं की समीक्षा और सुधार की प्रक्रिया भी जारी है।







