मुख्य बातें
- यूरोप में भारत जैसा पारंपरिक मानसून नहीं आता, बल्कि अटलांटिक महासागर से आने वाली पश्चिमी नम हवाएं वर्षा कराती हैं।
- यूरोप में भीषण गर्मी के दौरान 10 हजार से अधिक अतिरिक्त मौतों का अनुमान सामने आया है, जिनमें अधिकांश बुजुर्ग हैं।
- इस वर्ष पश्चिमी नम हवाओं के कमजोर रहने से कई यूरोपीय देशों में गर्मी लंबे समय तक बनी हुई है।
- भारत और यूरोप की जलवायु, भौगोलिक स्थिति तथा मौसम प्रणाली एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं।

यूरोप में मानसून को लेकर हर साल लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं, लेकिन इस बार यह चर्चा और तेज हो गई है। इसकी वजह है यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, लगातार चल रही हीटवेव और उससे जुड़ी हजारों अतिरिक्त मौतों की खबरें। एक तरफ भारत के अधिकांश हिस्सों में दक्षिण-पश्चिम मानसून सक्रिय होकर तेज बारिश करा रहा है, वहीं यूरोप के कई देशों में तापमान 40 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बाद जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और यूरोप की जलवायु प्रणाली पूरी तरह अलग है। इसलिए दोनों क्षेत्रों में बारिश होने की प्रक्रिया भी अलग-अलग मौसमीय तंत्र पर आधारित होती है। यही कारण है कि भारत में मानसून आने के बाद जहां तापमान में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिलती है, वहीं यूरोप में ऐसी कोई व्यापक मानसूनी प्रणाली मौजूद नहीं है।
हाल के सप्ताहों में यूरोप के कई देशों में लगातार बनी भीषण गर्मी ने स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में बुजुर्ग नागरिक इस हीटवेव से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। मौसम वैज्ञानिक इसे केवल एक मौसमी घटना नहीं बल्कि बदलती जलवायु और चरम मौसम की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी देख रहे हैं।
यूरोप में मानसून क्यों अलग है
भारत में मानसून हिंद महासागर और अरब सागर से आने वाली विशाल नम हवाओं का मौसमी चक्र है, जो जून से सितंबर के बीच पूरे देश में व्यापक वर्षा कराता है। इसके विपरीत यूरोप में भारत जैसी मानसूनी प्रणाली विकसित नहीं होती।
यूरोप के अधिकांश हिस्सों में वर्षा का प्रमुख स्रोत अटलांटिक महासागर से आने वाली पश्चिमी नम हवाएं होती हैं। ये हवाएं पूरे गर्मी के मौसम में समय-समय पर वर्षा कराती हैं और तापमान को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कई लोग इन्हें सामान्य भाषा में “यूरोपीय मानसून” कह देते हैं, लेकिन मौसम विज्ञान की दृष्टि से यह भारतीय मानसून जैसा तंत्र नहीं है।
अटलांटिक हवाओं की भूमिका
यूरोप के पश्चिमी भाग, विशेषकर ब्रिटेन, आयरलैंड, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और पश्चिमी जर्मनी जैसे क्षेत्रों में अटलांटिक महासागर का प्रभाव बहुत अधिक रहता है।
जब महासागर से ठंडी और नम हवाएं महाद्वीप की ओर बढ़ती हैं, तो वे बादल और वर्षा लेकर आती हैं। इससे तापमान में गिरावट आती है और लंबे समय तक गर्मी नहीं टिकती। लेकिन यदि ये हवाएं कमजोर पड़ जाएं या देर से सक्रिय हों, तो गर्म हवा लंबे समय तक बनी रहती है और हीटवेव की स्थिति पैदा हो सकती है।
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ष ऐसी ही स्थिति देखने को मिली, जिसके कारण कई यूरोपीय देशों में राहत देने वाली वर्षा समय पर नहीं पहुंच सकी।
भारत और यूरोप की जलवायु में अंतर
भारत उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में स्थित है। यहां सूर्य की किरणें वर्ष के अधिकांश समय अपेक्षाकृत सीधी पड़ती हैं। इसी कारण देश के बड़े हिस्से में गर्मी अधिक रहती है और मानसून पूरे मौसम चक्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
इसके विपरीत यूरोप का अधिकांश भाग समशीतोष्ण क्षेत्र में आता है। यहां सामान्य परिस्थितियों में मौसम अपेक्षाकृत ठंडा रहता है और तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव कम देखा जाता है। यही कारण है कि जब वहां अचानक 40 डिग्री या उससे अधिक तापमान दर्ज होता है, तो उसका प्रभाव भारत की तुलना में कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।
43 डिग्री पर संकट क्यों
भारत के कई शहरों में 42 से 45 डिग्री सेल्सियस तापमान हर वर्ष देखने को मिलता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में यह सामान्य गर्मी का हिस्सा माना जाता है। इसके विपरीत यूरोप के अधिकांश देशों में 40 डिग्री से ऊपर का तापमान असामान्य और अत्यधिक खतरनाक माना जाता है।
इसका सबसे बड़ा कारण वहां की जलवायु और लोगों की अनुकूलन क्षमता है। यूरोप के अधिकांश क्षेत्रों में लंबे समय तक ठंडा या मध्यम मौसम रहता है। वहां के घर, कार्यालय और सार्वजनिक भवन भी इसी मौसम को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। कई पुराने भवन गर्मी को बाहर निकालने के बजाय अंदर रोककर रखने वाली संरचना वाले हैं। जब बाहर का तापमान अचानक बहुत बढ़ जाता है तो इन इमारतों के भीतर भी गर्मी तेजी से बढ़ जाती है।
तापमान बढ़ने का शरीर पर असर
मानव शरीर धीरे-धीरे बदलते मौसम के अनुरूप खुद को ढाल लेता है। भारत में गर्मी धीरे-धीरे बढ़ती है, इसलिए अधिकांश लोगों का शरीर ऊंचे तापमान के प्रति अपेक्षाकृत अनुकूल हो जाता है।
यूरोप में कई बार कुछ ही दिनों में तापमान 10 से 15 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। इतनी तेज वृद्धि शरीर के लिए अतिरिक्त तनाव पैदा करती है। इससे हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हृदय संबंधी समस्याएं और सांस लेने में कठिनाई जैसी स्थितियां बढ़ सकती हैं। बुजुर्ग, छोटे बच्चे और पहले से बीमार लोग सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं।
यूरोप में मानसून नहीं, अलग वर्षा प्रणाली
मौसम विज्ञान के अनुसार मानसून केवल बारिश का नाम नहीं है। यह हवा की दिशा में मौसमी बदलाव और उससे जुड़ी व्यापक जलवायु प्रणाली होती है। भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून इसी सिद्धांत पर काम करता है।
यूरोप में वर्षा मुख्य रूप से अटलांटिक महासागर से आने वाली पश्चिमी हवाओं, निम्न दबाव वाले क्षेत्रों और स्थानीय मौसम प्रणालियों पर निर्भर करती है। इसलिए वहां पूरे महाद्वीप में भारत जैसी एकसमान मानसूनी प्रणाली नहीं बनती।
हालांकि कुछ मौसम विशेषज्ञ सामान्य भाषा में गर्मियों के दौरान सक्रिय नम पश्चिमी हवाओं को “यूरोपीय मानसून” कह देते हैं, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह आधिकारिक मानसूनी तंत्र नहीं माना जाता।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
पिछले कुछ वर्षों में यूरोप में लगातार रिकॉर्ड तापमान दर्ज किए गए हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव की तीव्रता, अवधि और आवृत्ति बढ़ रही है।
तापमान बढ़ने के साथ जंगलों में आग, सूखा, पानी की कमी और कृषि उत्पादन पर असर जैसी समस्याएं भी बढ़ती हैं। कई यूरोपीय देशों ने पहले ही गर्मी से बचाव के लिए विशेष स्वास्थ्य योजनाएं, सार्वजनिक चेतावनी प्रणाली और हीट एक्शन प्लान लागू किए हैं।
स्वास्थ्य एजेंसियां क्यों चिंतित हैं
यूरोप में मृत्यु दर की निगरानी करने वाले नेटवर्क द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार हालिया हीटवेव के दौरान 10 हजार से अधिक अतिरिक्त मौतों का अनुमान सामने आया है। इनमें बड़ी संख्या 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की बताई गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक गर्मी केवल हीट स्ट्रोक से ही मौत का कारण नहीं बनती। यह पहले से मौजूद हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी, उच्च रक्तचाप और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ा सकती है। इसलिए हीटवेव को अब सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा के रूप में देखा जाने लगा है।
भारत क्या सीख सकता है
हालांकि भारत लंबे समय से भीषण गर्मी का सामना करता आया है, लेकिन जलवायु परिवर्तन का असर यहां भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है। कई राज्यों में अब हीट एक्शन प्लान तैयार किए जा रहे हैं, स्कूलों के समय में बदलाव किया जा रहा है और लोगों को दोपहर के समय बाहर न निकलने की सलाह दी जाती है।
यूरोप का अनुभव यह बताता है कि यदि किसी क्षेत्र की जलवायु अचानक बदलती है तो केवल मौसम ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था, शहरी योजना, बिजली, जल आपूर्ति और आपदा प्रबंधन की पूरी प्रणाली को नई परिस्थितियों के अनुसार तैयार करना पड़ता है।
निष्कर्ष
यूरोप में मानसून को लेकर अक्सर भ्रम बना रहता है, लेकिन मौसम विज्ञान के अनुसार वहां भारत जैसा पारंपरिक मानसून नहीं आता। यूरोप में वर्षा का मुख्य आधार अटलांटिक महासागर से आने वाली पश्चिमी नम हवाएं हैं, जबकि भारत का मानसून एक विशाल मौसमी पवन प्रणाली पर आधारित है।
हालिया हीटवेव ने यह भी दिखाया है कि किसी क्षेत्र में केवल तापमान का आंकड़ा ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि वहां की जलवायु, बुनियादी ढांचा, लोगों की अनुकूलन क्षमता और स्वास्थ्य व्यवस्था भी उतनी ही अहम होती है। यूरोप में मानसून और भारत के मानसून के बीच यही सबसे बड़ा अंतर है। बदलती जलवायु के दौर में दोनों क्षेत्रों के अनुभव दुनिया के लिए महत्वपूर्ण सीख बन रहे हैं।
FAQ)
1. यूरोप में मानसून क्या भारत जैसा होता है?
नहीं। यूरोप में मानसून भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून जैसा नहीं होता। यूरोप में वर्षा मुख्य रूप से अटलांटिक महासागर से आने वाली पश्चिमी नम हवाओं और निम्न दबाव प्रणालियों के कारण होती है। सामान्य बोलचाल में इसे “यूरोपीय मानसून” कहा जाता है, लेकिन मौसम विज्ञान में यह भारतीय मानसून जैसी अलग मौसमी प्रणाली नहीं मानी जाती।
2. यूरोप में 40 से 43 डिग्री तापमान इतना खतरनाक क्यों माना जाता है?
यूरोप की जलवायु सामान्यतः समशीतोष्ण और अपेक्षाकृत ठंडी रहती है। वहां के भवन, शहरी ढांचा और लोगों का शरीर अत्यधिक गर्मी के लिए भारत जितना अनुकूल नहीं है। अचानक तापमान बढ़ने से हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
3. यूरोप में हालिया हीटवेव से सबसे अधिक प्रभावित कौन रहा है?
उपलब्ध स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार हालिया हीटवेव में सबसे अधिक प्रभाव 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों पर पड़ा। विशेषज्ञों का कहना है कि बुजुर्ग, पहले से बीमार व्यक्ति और छोटे बच्चे अत्यधिक गर्मी के दौरान सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं।
4. क्या जलवायु परिवर्तन यूरोप की हीटवेव को और गंभीर बना रहा है?
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण यूरोप में लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव और रिकॉर्ड तापमान की घटनाएं पहले की तुलना में अधिक बार देखने को मिल रही हैं। हालांकि किसी एक घटना का कारण केवल जलवायु परिवर्तन को नहीं माना जाता, लेकिन यह चरम मौसम की घटनाओं की संभावना बढ़ाता है।
5. भारत और यूरोप की वर्षा प्रणाली में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
भारत की अधिकांश वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है, जो अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर पूरे देश में बारिश कराता है। इसके विपरीत यूरोप में वर्षा वर्षभर विभिन्न मौसम प्रणालियों, अटलांटिक की पश्चिमी हवाओं और निम्न दबाव वाले क्षेत्रों के कारण होती है।
6. क्या यूरोप में भी मानसून शब्द का उपयोग किया जाता है?
कुछ मौसम विशेषज्ञ और आम लोग गर्मियों के दौरान सक्रिय होने वाली नम पश्चिमी हवाओं को अनौपचारिक रूप से “यूरोपीय मानसून” कह देते हैं। हालांकि यह वैज्ञानिक रूप से भारत, दक्षिण एशिया या अफ्रीका में पाए जाने वाले वास्तविक मानसूनी तंत्र के समान नहीं है।
7. क्या भविष्य में यूरोप में ऐसी ही भीषण गर्मी बार-बार देखने को मिल सकती है?
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जलवायु के कारण भविष्य में यूरोप में हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ सकती है। इसलिए कई यूरोपीय देश हीट एक्शन प्लान, स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली और शहरी ढांचे में बदलाव जैसे उपायों पर काम कर रहे हैं।







