मुख्य बातें
- पोलोग्राउंड स्थित पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के परिसर में सात मंजिला आवासीय इमारत लगभग तैयार बताई गई है।
- रिपोर्ट के अनुसार, भवन के लिए नगर निगम की निर्माण अनुमति और फायर एनओसी का आवेदन नहीं मिला।
- वर्ष 2021 के फायर प्लान में 25 हजार लीटर के ओवरहेड टैंक सहित अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाएं दिखाई गई थीं, लेकिन मौके पर इन प्रावधानों को लेकर सवाल उठे।
- निगमायुक्त क्षितिज सिंघल ने मामले की जांच कर कार्रवाई करने की बात कही है।

इंदौर बिजली कंपनी बिल्डिंग को लेकर उठे सवाल सरकारी निर्माण परियोजनाओं में अनुमति, अग्नि सुरक्षा और जवाबदेही की अहमियत को सामने लाते हैं। पोलोग्राउंड स्थित मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के जीपीएच परिसर में सात मंजिला आवासीय इमारत लगभग तैयार बताई गई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, इस भवन के लिए नगर निगम से भवन निर्माण की अनुमति नहीं ली गई और न ही अग्निशमन विभाग से अनिवार्य अनापत्ति प्रमाणपत्र यानी फायर एनओसी प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी की गई। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शहर में अग्नि सुरक्षा नियमों के उल्लंघन को लेकर निजी इमारतों पर कार्रवाई की जा रही है, जबकि सवाल अब एक सरकारी बिजली कंपनी के परिसर में बने भवन पर उठे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इमारत के निर्माण को बिजली कंपनी ने 7 मई 2022 को मंजूरी दी थी और इस पर चार करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने की जानकारी दी गई है। भवन का फायर प्लान 25 फरवरी 2021 को स्वीकृत हुआ था, लेकिन आरोप है कि निर्माण शुरू करने से पहले जरूरी प्रोविजनल फायर एनओसी के लिए आवेदन ही नहीं किया गया। इमारत में 24 आवासीय फ्लैट, भूतल पर पार्किंग और लिफ्ट होने की जानकारी भी सामने आई है। नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने कहा है कि बिना भवन अनुमति और फायर एनओसी के किसी विभाग को निर्माण की छूट नहीं है और मामले की जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
इंदौर बिजली कंपनी बिल्डिंग पर उठे सवाल
पोलोग्राउंड स्थित जीपीएच परिसर में बनी सात मंजिला आवासीय इमारत को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि निर्माण के लिए आवश्यक अनुमतियां ली गई थीं या नहीं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, भवन लगभग तैयार है, लेकिन नगर निगम से भवन निर्माण की अनुमति का रिकॉर्ड नहीं मिला। इसी तरह फायर एनओसी के लिए आवेदन किए जाने की जानकारी भी सामने नहीं आई। यदि जांच में इन तथ्यों की पुष्टि होती है, तो यह स्पष्ट करना होगा कि निर्माण की मंजूरी, भवन की स्वीकृति और अग्नि सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग चरणों का पालन किस तरह किया गया।
यह मामला केवल किसी भवन के कागजात तक सीमित नहीं है। बहुमंजिला इमारतों में आग लगने की स्थिति में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने, आग को फैलने से रोकने और दमकल वाहनों को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए उपयुक्त व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इसलिए भवन निर्माण की अनुमति और फायर एनओसी जैसी प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय हैं। सरकारी संस्थान के परिसर में निर्माण होने से इन आवश्यकताओं का महत्व कम नहीं होता।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि जांच पूरी हो चुकी है या किसी अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय कर दी गई है। रिपोर्ट में अनुमति और अग्नि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जबकि निगमायुक्त ने जांच के बाद कार्रवाई की बात कही है। इसलिए अंतिम स्थिति का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, स्थल निरीक्षण और विभागीय जांच के निष्कर्षों से ही हो सकेगा।
2022 में मिली थी निर्माण मंजूरी
रिपोर्ट के अनुसार, बिजली कंपनी ने इस भवन के निर्माण को 7 मई 2022 को मंजूरी दी थी। इमारत की लागत चार करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। हालांकि, किसी विभाग के भीतर परियोजना को मंजूरी मिलना और स्थानीय निकाय से भवन निर्माण की अनुमति प्राप्त करना एक ही बात नहीं है। यही अंतर इस मामले में जांच का प्रमुख विषय बन सकता है।
यदि किसी सरकारी संस्था ने अपने परिसर में भवन बनाने का निर्णय लिया, तो परियोजना से जुड़े अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होता है कि संबंधित निर्माण के लिए लागू सभी आवश्यक स्वीकृतियां ली गई हों। इनमें भवन का नक्शा, निर्माण अनुमति और इमारत की प्रकृति व ऊंचाई के अनुसार जरूरी अग्नि सुरक्षा मंजूरी शामिल हो सकती है। बिजली कंपनी की आंतरिक मंजूरी अपने आप इन दूसरी अनुमतियों का विकल्प नहीं बनती।
इसलिए जांच में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परियोजना के आरंभ से पहले कौन-कौन से दस्तावेज तैयार किए गए, किन अधिकारियों ने उनकी जांच की और क्या संबंधित अनुमति लेने की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से तय थी। उपलब्ध रिपोर्ट में बिजली कंपनी की ओर से निर्माण की आंतरिक मंजूरी की तारीख दी गई है, लेकिन नगर निगम की अनुमति का दस्तावेज सामने नहीं आने की बात कही गई है। इस अंतर को आधिकारिक रिकॉर्ड से स्पष्ट करना जरूरी होगा।
फायर प्लान था, व्यवस्था पर सवाल
भवन से संबंधित एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उसका फायर प्लान 25 फरवरी 2021 को स्वीकृत बताया गया है। इस योजना में 25 हजार लीटर क्षमता का ओवरहेड पानी का टैंक, सात फायर बॉक्स, सात हाइड्रेंट वाल्व और दमकल विभाग के लिए टू-वे इनलेट जैसी व्यवस्थाएं दर्शाई गई थीं। रिपोर्ट के अनुसार, फायर प्लान पर बिजली कंपनी के सिविल अधिकारियों के हस्ताक्षर भी थे।
लेकिन योजना में किसी व्यवस्था का उल्लेख होना और निर्माण के बाद उसे वास्तविक रूप से स्थापित करना अलग-अलग बातें हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि छत पर निर्धारित क्षमता वाला टैंक नहीं बनाया गया। इसके स्थान पर फ्लैटों में पानी की आपूर्ति के लिए एक-एक हजार लीटर की पीवीसी टंकियां रखी होने की जानकारी दी गई है। भूमिगत संपवेल नहीं होने का सवाल भी उठाया गया है।
यदि स्थल निरीक्षण में फायर प्लान और वास्तविक निर्माण के बीच अंतर पाया जाता है, तो यह पता लगाना आवश्यक होगा कि योजना में निर्धारित व्यवस्थाओं को क्यों नहीं बनाया गया और क्या भवन का निर्माण किसी संशोधित स्वीकृति के आधार पर हुआ था। उपलब्ध जानकारी में ऐसी किसी संशोधित मंजूरी का उल्लेख नहीं है। इसलिए यह विषय जांच के दायरे में स्पष्ट रूप से आना चाहिए।
फायर प्लान का उद्देश्य केवल फाइल में सुरक्षा उपकरणों की सूची तैयार करना नहीं होता। भवन में पानी की पर्याप्त उपलब्धता, आग बुझाने के उपकरणों की पहुंच और आपात स्थिति में उनका संचालन सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। किसी व्यवस्था की वास्तविक उपयोगिता इस पर निर्भर करती है कि वह स्थापित है या नहीं, मानकों के अनुरूप है या नहीं और जरूरत पड़ने पर काम कर सकती है या नहीं।
सात मंजिल और 24 आवासीय फ्लैट
उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस इमारत में कुल 24 आवासीय फ्लैट बनाए गए हैं। छह मंजिलों पर चार-चार फ्लैट हैं, जबकि भूतल पर पार्किंग की व्यवस्था बताई गई है। भवन में लिफ्ट भी लगी हुई है। रिपोर्ट में लिफ्ट के लिए अलग अनुमति नहीं लिए जाने का दावा किया गया है। हालांकि, लिफ्ट की अनुमति किस विभाग से और किस नियम के तहत अपेक्षित थी, इसकी आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों से की जानी चाहिए।
बहुमंजिला आवासीय भवनों में सुरक्षा की जरूरत केवल आग बुझाने के उपकरणों तक सीमित नहीं होती। लोगों के सुरक्षित आवागमन, आपात स्थिति में बाहर निकलने, बिजली व्यवस्था और अग्निशमन उपकरणों की कार्यशीलता जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण हैं। लिफ्ट होने से भवन में रहने वालों को सामान्य दिनों में सुविधा मिलती है, लेकिन आपात स्थिति में निकासी की योजना और सुरक्षित सीढ़ियों की उपलब्धता भी उतनी ही अहम रहती है।
इमारत में फ्लैटों की संख्या और मंजिलों का विवरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां एक व्यक्ति के बजाय कई परिवारों के रहने की व्यवस्था बनाई गई है। यदि भवन में सुरक्षा से जुड़ी कोई कमी पाई जाती है, तो उसका असर एक से अधिक परिवारों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि आवासीय निर्माण में जरूरी स्वीकृतियों और सुरक्षा प्रावधानों की जांच निर्माण के दौरान और उपयोग शुरू होने से पहले की जानी चाहिए।
फिलहाल उपलब्ध रिपोर्ट में भवन के उपयोग की औपचारिक शुरुआत, सभी फ्लैटों में लोगों के रहने या लिफ्ट के संचालन की स्थिति स्पष्ट नहीं है। इसलिए यह दावा करना उचित नहीं होगा कि इमारत में लोग रह रहे हैं या सभी सुविधाएं उपयोग में हैं। जांच में इन पहलुओं को भी स्पष्ट किया जा सकता है।
निजी इमारतों पर कार्रवाई, सरकारी भवन पर सवाल
इंदौर में पिछले कुछ महीनों से अग्नि सुरक्षा के नाम पर कई दुकानों और इमारतों को सील किए जाने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 151 से अधिक इमारतों को सील किया जा चुका है। इसी पृष्ठभूमि में बिजली कंपनी के परिसर में बने भवन पर उठे सवालों ने नियमों के समान अनुपालन का मुद्दा सामने ला दिया है।
यदि निजी भवनों के खिलाफ कार्रवाई भवन अनुमति या अग्नि सुरक्षा संबंधी कमियों के आधार पर की जा रही है, तो समान नियमों के दायरे में आने वाली सरकारी संस्थाओं की इमारतों की भी जांच होनी चाहिए। नियमों की विश्वसनीयता तभी कायम रहती है जब उनका पालन सभी पर समान रूप से लागू हो। सरकारी स्वामित्व किसी भवन को अपने आप सुरक्षा मानकों से छूट नहीं देता।
हालांकि, निजी इमारतों को सील करने के प्रत्येक मामले और इस भवन की स्थिति की कानूनी तुलना करने के लिए संबंधित आदेशों, भवन की श्रेणी और लागू नियमों की जानकारी जरूरी होगी। उपलब्ध रिपोर्ट सभी 151 से अधिक इमारतों के मामलों का विस्तृत विवरण नहीं देती। इसलिए यहां मुख्य सवाल समान नियमों के पालन और जांच की पारदर्शिता का है, न कि यह मान लेना कि सभी मामलों की परिस्थितियां बिल्कुल एक जैसी हैं।
निगम और प्रशासन के लिए इस मामले में निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण होगी। यदि भवन निर्माण अनुमति या अग्नि सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि आगे क्या कार्रवाई की जाएगी और सुरक्षा संबंधी कमियों को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। कार्रवाई की प्रकृति संबंधित नियमों और जांच में सामने आने वाले तथ्यों के अनुसार तय होनी चाहिए।
फायर एनओसी पर नियम क्या कहते हैं
रिपोर्ट में पूर्व फायर अधिकारी रविकांत मिश्रा के हवाले से कहा गया है कि नेशनल बिल्डिंग कोड के भाग चार के तहत अग्नि सुरक्षा संबंधी प्रावधानों का पालन आवश्यक है और सरकारी भवनों को इससे छूट नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि सात मंजिला इमारत में निर्धारित अग्नि सुरक्षा व्यवस्था के तहत पानी की उपलब्धता और संबंधित उपकरणों की जरूरत होती है। उनके अनुसार, फायर एनओसी के लिए भवन की अनुमति और योजना के साथ आवेदन किया जाना चाहिए, लेकिन इस इमारत के लिए आवेदन नहीं मिला।
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। किसी भवन का फायर प्लान स्वीकृत होना, निर्माण से पहले जरूरी अस्थायी या प्रोविजनल फायर एनओसी प्राप्त करना और भवन तैयार होने के बाद लागू नियमों के अनुसार अग्नि सुरक्षा की जांच पूरी करना अलग-अलग चरण हो सकते हैं। किस चरण में कौन-सी अनुमति आवश्यक है, यह भवन की श्रेणी, ऊंचाई, उपयोग और लागू नियमों पर निर्भर कर सकता है। इसलिए जांच में संबंधित समय पर लागू प्रावधानों और भवन की स्वीकृत योजना का मिलान करना जरूरी होगा।
इस मामले में रिपोर्ट का आरोप है कि फायर प्लान स्वीकृत होने के बावजूद प्रोविजनल एनओसी के लिए आवेदन नहीं किया गया। यदि आधिकारिक रिकॉर्ड भी यही दर्शाता है, तो सवाल उठेगा कि निर्माण की शुरुआत से पहले आवश्यक प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हुई। साथ ही, यह भी स्पष्ट करना होगा कि भवन की वर्तमान स्थिति में कौन-कौन सी अग्नि सुरक्षा व्यवस्थाएं मौजूद हैं और कौन-सी कमी पाई गई है।
केवल फाइल में योजना होने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि आपात स्थिति में भवन सुरक्षित है। उसी तरह, किसी कमी की सूचना मिलने भर से सभी कानूनी निष्कर्ष निकाल लेना भी उचित नहीं है। दस्तावेजों, स्थल निरीक्षण और संबंधित अधिकारियों के जवाब के आधार पर ही अंतिम स्थिति सामने आ सकती है।
निगमायुक्त ने जांच का भरोसा दिया
मामले पर नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने कहा कि शासन स्तर पर किसी भी विभाग को भवन निर्माण अनुमति और फायर एनओसी के बिना इमारत बनाने की छूट नहीं दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि भवन कैसे बना, इसकी जांच कराई जाएगी और कार्रवाई की जाएगी।
यह बयान मामले में अगला महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम तय करता है। अब जांच के जरिए यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि नगर निगम के रिकॉर्ड में इस भवन के लिए कोई आवेदन, स्वीकृति या संशोधित नक्शा मौजूद है या नहीं। इसी तरह अग्निशमन विभाग के रिकॉर्ड में प्रोविजनल एनओसी या अंतिम अग्नि सुरक्षा मंजूरी से संबंधित कोई दस्तावेज है या नहीं, यह भी जांच का विषय होगा।
यदि अनुमति नहीं ली गई थी, तो यह भी पता लगाना जरूरी है कि निर्माण किस स्तर पर और किस निगरानी में आगे बढ़ा। किसी सरकारी संस्था की परियोजना में जिम्मेदारी केवल निर्माण कार्य कराने तक सीमित नहीं रहती। संबंधित नियमों का पालन, जरूरी स्वीकृतियां हासिल करना और सुरक्षा मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना भी परियोजना प्रबंधन का हिस्सा होता है।
निगमायुक्त के बयान में जांच और कार्रवाई की बात कही गई है, लेकिन उपलब्ध जानकारी में जांच पूरी होने, किसी अधिकारी को दोषी ठहराए जाने या दंडात्मक कार्रवाई किए जाने की पुष्टि नहीं है। इसलिए फिलहाल इसे जांच की घोषणा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आगे की स्थिति संबंधित विभागों के रिकॉर्ड और जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगी।
अधिकारियों के जवाब से नहीं मिली स्पष्टता
रिपोर्ट में बिजली कंपनी के अधिकारियों से संपर्क करने के प्रयासों का भी उल्लेख है। कंपनी के सीजीएम प्रकाश सिंह चौहान ने कहा कि निर्माण शुरू होने के समय अनुमति ली गई होगी। उन्होंने यह भी बताया कि उनसे पहले रिंकेश वैश्य और उनसे पहले संतोष टैगोर इस पद का प्रभार संभाल चुके थे। रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों अधिकारियों से बात करने पर भी भवन अनुमति और फायर एनओसी को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं मिली।
कार्यपालन यंत्री अजीज बूटवाला से संपर्क करने पर उन्होंने वायरल होने और छुट्टी पर रहने की बात कही। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वह शाम छह बजे तक कार्यालय में मौजूद थे। इस दावे और अधिकारी के कथन के बीच अंतर को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करने की जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे रिपोर्ट में दर्ज आरोप के रूप में ही समझना चाहिए।
अधीक्षण यंत्री डीके वैध ने पहले कहा कि फाइल में सभी अनुमतियां होनी चाहिए और वह भोपाल में हैं। उन्होंने बाद में सोमवार को स्थिति स्पष्ट करने की बात कही। रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को उन्होंने बुधवार दोपहर 12 बजे तक फोन कर जानकारी देने और फाइल दिखाने का आश्वासन दिया, लेकिन बुधवार को जवाब नहीं मिला और फोन भी नहीं उठाया गया।
इन संपर्कों से सामने आई अस्पष्टता का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि कोई अनुमति निश्चित रूप से मौजूद नहीं है। लेकिन जब किसी सार्वजनिक परियोजना की वैधानिक मंजूरियों पर सवाल उठें, तो संबंधित विभाग से दस्तावेजों सहित स्पष्ट जवाब मिलना आवश्यक है। यदि अनुमति ली गई है, तो उसकी प्रति और जारी करने वाले विभाग का विवरण संदेह दूर कर सकता है। यदि अनुमति नहीं ली गई, तो विभाग को यह बताना होगा कि ऐसा क्यों हुआ और आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।
सरकारी परियोजनाओं में दस्तावेजों की उपलब्धता और जवाबदेही का महत्व इसी कारण बढ़ जाता है। नागरिकों को यह भरोसा होना चाहिए कि भवन निर्माण से जुड़े नियमों की जांच किसी संस्था के पद या स्वामित्व के आधार पर अलग-अलग नहीं होगी।
सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति जांचना जरूरी
इस इमारत से जुड़े सवालों में एक अहम पहलू यह है कि फायर प्लान में जिन व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया था, वे मौके पर किस स्थिति में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, योजना में 25 हजार लीटर के ओवरहेड पानी के टैंक का प्रावधान था, जबकि छत पर एक-एक हजार लीटर की पीवीसी टंकियां दिखाई देने की बात कही गई है। भूमिगत संपवेल के नहीं होने का दावा भी किया गया है। इन बिंदुओं की पुष्टि तकनीकी निरीक्षण से होना आवश्यक है।
अग्नि सुरक्षा का उद्देश्य आग लगने के बाद केवल दमकल को बुलाना नहीं है। भवन में आग पर शुरुआती नियंत्रण, पानी की उपलब्धता, आग बुझाने वाले उपकरणों की पहुंच और लोगों के सुरक्षित बाहर निकलने की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित करनी होती है। बहुमंजिला आवासीय भवन में किसी आपात स्थिति के दौरान समय बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। इसीलिए सुरक्षा से जुड़े प्रावधान कागज पर दर्ज होने के साथ जमीन पर मौजूद और उपयोग योग्य भी होने चाहिए।
जांच में यह भी देखा जा सकता है कि फायर बॉक्स, हाइड्रेंट वाल्व और दमकल विभाग के लिए निर्धारित इनलेट लगाए गए हैं या नहीं। यदि ये उपकरण लगाए गए हैं, तो उनकी स्थिति और काम करने की क्षमता की जांच आवश्यक होगी। इसी तरह पानी के टैंक की क्षमता, उसके स्रोत और अग्नि सुरक्षा व्यवस्था से उसके जुड़ाव का सत्यापन तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए।
इन विवरणों का उद्देश्य किसी निष्कर्ष पर पहले से पहुंचना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भवन की सुरक्षा व्यवस्था वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हो। यदि कमियां मिलती हैं, तो संबंधित विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें किस समयसीमा में दूर किया जाएगा और अनुपालन की पुष्टि कौन करेगा।
लिफ्ट और पार्किंग से जुड़े प्रश्न
भवन में लिफ्ट और भूतल पर पार्किंग की व्यवस्था बताई गई है। रिपोर्ट में लिफ्ट के लिए अनुमति नहीं लिए जाने का दावा है। इस बिंदु पर जांच में संबंधित अनुमति रिकॉर्ड, लिफ्ट की स्थापना से जुड़े दस्तावेज और लागू तकनीकी नियमों का मिलान किया जाना चाहिए। उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं होता कि संबंधित विभाग ने लिफ्ट की स्थिति पर कोई औपचारिक निरीक्षण किया है या नहीं।
बहुमंजिला इमारत में लिफ्ट, सीढ़ियों, बिजली आपूर्ति और आपातकालीन निकासी के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होता है। आग जैसी स्थिति में लिफ्ट के इस्तेमाल को लेकर विशेष सुरक्षा निर्देश लागू हो सकते हैं, इसलिए भवन में रहने वालों को सुरक्षित निकासी के विकल्पों की जानकारी देना भी आवश्यक है। यदि इमारत में परिवारों को रहने के लिए फ्लैट उपलब्ध कराए जाने हैं, तो उपयोग से पहले जरूरी सुरक्षा परीक्षणों और अनुमतियों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
भूतल पर पार्किंग का प्रावधान भी भवन की योजना का हिस्सा है। जांच में यह देखा जा सकता है कि वास्तविक निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुरूप है या नहीं और भवन के प्रवेश तथा आपातकालीन पहुंच के रास्ते बाधित तो नहीं हैं। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में पार्किंग के रास्ते या पहुंच को लेकर कोई विशिष्ट उल्लंघन दर्ज नहीं है। इसलिए इन पहलुओं को स्थापित तथ्य के बजाय निरीक्षण के संभावित विषय के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सरकारी भवनों में जवाबदेही का सवाल
सरकारी संस्थानों की इमारतें सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ी होती हैं और उनसे नियमों के पालन की अपेक्षा विशेष रूप से की जाती है। बिजली वितरण कंपनी जैसे संस्थान के परिसर में आवासीय भवन बनाते समय परियोजना की स्वीकृति, खर्च, निर्माण गुणवत्ता और सुरक्षा संबंधी अनुमतियों का रिकॉर्ड व्यवस्थित होना चाहिए। इससे न केवल नियमों का पालन सुनिश्चित होता है, बल्कि किसी विवाद या जांच की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना भी आसान होता है।
इस मामले में चार करोड़ रुपये से अधिक लागत की जानकारी सामने आई है। इसलिए जांच में निर्माण की लागत के साथ परियोजना की स्वीकृति प्रक्रिया और संबंधित विभागों से ली गई अनुमतियों की स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए। परियोजना को आंतरिक मंजूरी देने वाले अधिकारियों और बाहरी वैधानिक अनुमतियों की जिम्मेदारी संभालने वालों की भूमिकाएं अलग-अलग हो सकती हैं। किस स्तर पर क्या जिम्मेदारी थी, यह संबंधित दस्तावेजों के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है।
यदि अनुमति लेने की प्रक्रिया में कमी पाई जाती है, तो जांच का उद्देश्य केवल भवन की स्थिति पर टिप्पणी करना नहीं होना चाहिए। यह भी समझना जरूरी होगा कि प्रक्रिया में चूक कैसे हुई, क्या निगरानी व्यवस्था काम कर रही थी और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या सुधार किए जा सकते हैं। इसी तरह, यदि कंपनी के पास सभी आवश्यक स्वीकृतियां मौजूद निकलती हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर विवाद दूर किया जा सकता है।
जांच में किन दस्तावेजों की जरूरत होगी
इस मामले में सबसे पहले नगर निगम के भवन अनुमति रिकॉर्ड की जांच उपयोगी होगी। इसमें भवन का स्वीकृत नक्शा, निर्माण अनुमति, किसी संशोधित योजना की मंजूरी और संबंधित आवेदन की स्थिति शामिल हो सकती है। यदि रिकॉर्ड में अनुमति नहीं मिलती, तो यह भी दर्ज होना चाहिए कि संबंधित परियोजना के लिए आवेदन किया गया था या नहीं और किसी स्तर पर उसे लंबित रखा गया था या नहीं।
दूसरा महत्वपूर्ण रिकॉर्ड अग्निशमन विभाग से संबंधित है। वर्ष 2021 में स्वीकृत बताए गए फायर प्लान की प्रति, प्रोविजनल फायर एनओसी के आवेदन की स्थिति और भवन की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण इस जांच को तथ्यात्मक आधार दे सकता है। यदि भवन के निर्माण के दौरान योजना में बदलाव हुआ था, तो उसके दस्तावेज भी सामने आने चाहिए।
तीसरा पहलू बिजली कंपनी के आंतरिक अभिलेखों से जुड़ा है। 7 मई 2022 को दी गई निर्माण मंजूरी, परियोजना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों का विवरण, निर्माण से संबंधित फाइल और कार्य पूर्ण होने के दस्तावेज यह समझने में मदद कर सकते हैं कि भवन किस प्रक्रिया के तहत तैयार हुआ। इन तीनों स्तरों के रिकॉर्ड का मिलान होने पर ही अनुमति और अनुपालन की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।
जांच की विश्वसनीयता के लिए स्थल निरीक्षण भी महत्वपूर्ण है। फाइलों में मौजूद फायर प्लान और भवन में स्थापित उपकरणों के बीच अंतर होने की स्थिति में उसका तकनीकी आकलन किया जाना चाहिए। निरीक्षण के निष्कर्ष और उसके आधार पर उठाए गए कदमों की जानकारी उपलब्ध कराना भी पारदर्शिता का हिस्सा हो सकता है।
आगे की कार्रवाई पर नजर
फिलहाल नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने जांच कर कार्रवाई करने की बात कही है। अब अगला चरण यह देखना होगा कि नगर निगम और संबंधित विभागों के रिकॉर्ड में कौन-सी अनुमतियां उपलब्ध हैं और भवन की वास्तविक स्थिति स्वीकृत योजना से मेल खाती है या नहीं। जांच में यदि किसी तरह का उल्लंघन सामने आता है, तो आगे की कार्रवाई लागू नियमों और निष्कर्षों के आधार पर तय की जानी चाहिए।
यह भी महत्वपूर्ण होगा कि संभावित सुरक्षा कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी और समयसीमा स्पष्ट हो। केवल जांच शुरू करने की घोषणा से भवन की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती। यदि किसी उपकरण या व्यवस्था की कमी की पुष्टि होती है, तो उसका सुधार, निरीक्षण और अनुपालन प्रमाणित करना जरूरी होगा। इसी तरह, यदि सभी आवश्यक अनुमतियां उपलब्ध पाई जाती हैं, तो दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि भवन को उपयोग में लाने की अनुमति मिल चुकी है या नहीं, वहां परिवार रह रहे हैं या नहीं, अथवा जांच के दौरान किसी तरह की रोक लगाने का आदेश दिया गया है। इन सवालों का जवाब संबंधित विभागों की आधिकारिक जानकारी से ही मिल सकेगा। इसलिए फिलहाल भवन को सील किए जाने या किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होने की बात कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
इंदौर बिजली कंपनी बिल्डिंग का बड़ा सवाल
इंदौर बिजली कंपनी बिल्डिंग का मामला सार्वजनिक निर्माण में सुरक्षा मानकों और विभागीय जवाबदेही की अहमियत सामने लाता है। एक ओर शहर में अग्नि सुरक्षा नियमों के उल्लंघन के मामलों में सीलिंग की कार्रवाई की जानकारी है, दूसरी ओर बिजली कंपनी के परिसर में सात मंजिला आवासीय इमारत की अनुमति और फायर एनओसी को लेकर सवाल उठे हैं। इस अंतर का जवाब केवल स्पष्ट दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से दिया जा सकता है।
भवन का फायर प्लान स्वीकृत होने के बावजूद रिपोर्ट में जिन व्यवस्थाओं की कमी बताई गई है, उनका स्थल निरीक्षण जरूरी है। इसी तरह, नगर निगम की अनुमति और प्रोविजनल फायर एनओसी के रिकॉर्ड की जांच से यह पता चल सकेगा कि निर्माण के समय लागू प्रक्रियाओं का पालन हुआ था या नहीं। निगमायुक्त ने कार्रवाई की बात कही है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष सामने आने तक आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
इंदौर बिजली कंपनी बिल्डिंग पर उठे सवालों का समाधान तभी माना जाएगा, जब भवन की अनुमति, अग्नि सुरक्षा व्यवस्था और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही पर स्पष्ट जानकारी सामने आए। सरकारी हो या निजी, बहुमंजिला इमारतों में सुरक्षा नियमों का पालन लोगों की जान-माल की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि जांच में क्या सामने आता है और क्या जरूरी कमियों को दूर करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाते हैं।
FAQ
1. इंदौर बिजली कंपनी बिल्डिंग को लेकर मुख्य शिकायत क्या है?
पोलोग्राउंड स्थित पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के परिसर में बनी सात मंजिला आवासीय इमारत के लिए नगर निगम की भवन निर्माण अनुमति और फायर एनओसी नहीं लिए जाने का आरोप है। रिपोर्ट में फायर प्लान में दर्शाई गई कुछ सुरक्षा व्यवस्थाओं के मौके पर नहीं होने का दावा भी किया गया है। इन बिंदुओं की आधिकारिक जांच जरूरी है।
2. इंदौर बिजली कंपनी बिल्डिंग का निर्माण कब मंजूर हुआ था?
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, बिजली कंपनी ने भवन निर्माण को 7 मई 2022 को मंजूरी दी थी। भवन का फायर प्लान 25 फरवरी 2021 को स्वीकृत बताया गया है। आंतरिक निर्माण मंजूरी और नगर निगम या अग्निशमन विभाग की वैधानिक अनुमति अलग प्रक्रियाएं हैं, जिनका रिकॉर्ड जांच में मिलाया जाना चाहिए।
3. सात मंजिला इमारत के फायर प्लान में कौन-सी व्यवस्थाएं थीं?
रिपोर्ट के अनुसार, फायर प्लान में 25 हजार लीटर का ओवरहेड पानी का टैंक, सात फायर बॉक्स, सात हाइड्रेंट वाल्व और टू-वे फायर ब्रिगेड इनलेट का प्रावधान था। रिपोर्ट में इनमें से कुछ व्यवस्थाओं की वास्तविक मौजूदगी पर सवाल उठाए गए हैं। इनकी स्थिति की पुष्टि तकनीकी निरीक्षण से होनी चाहिए।
4. क्या सरकारी भवन को फायर एनओसी से छूट मिल सकती है?
रिपोर्ट में पूर्व फायर अधिकारी रविकांत मिश्रा ने कहा है कि अग्नि सुरक्षा नियम सरकारी भवनों पर भी लागू होते हैं। हालांकि, किसी खास भवन पर लागू सटीक आवश्यकताएं उसकी श्रेणी, ऊंचाई, उपयोग और संबंधित समय के नियमों पर निर्भर कर सकती हैं। अंतिम स्थिति संबंधित विभागों के नियमों और दस्तावेजों से तय होगी।
5. इंदौर नगर निगम ने इस मामले में क्या कहा है?
नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने कहा है कि किसी विभाग को बिना भवन निर्माण अनुमति और फायर एनओसी के निर्माण की छूट नहीं है। उन्होंने यह पता लगाने के लिए जांच कराने और कार्रवाई करने की बात कही कि इमारत कैसे बनी। उपलब्ध जानकारी में जांच के अंतिम निष्कर्ष या किसी दंडात्मक कार्रवाई की पुष्टि नहीं है।
6. क्या इंदौर बिजली कंपनी बिल्डिंग में लोग रहने लगे हैं?
उपलब्ध रिपोर्ट में भवन में 24 फ्लैट होने, भूतल पर पार्किंग और लिफ्ट की जानकारी दी गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि सभी फ्लैटों में लोग रह रहे हैं या भवन को औपचारिक रूप से उपयोग की अनुमति मिली है। इसकी पुष्टि संबंधित कंपनी या प्रशासन के आधिकारिक बयान से की जानी चाहिए।
7. इस मामले में आगे क्या कार्रवाई हो सकती है?
जांच में नगर निगम की भवन अनुमति, अग्निशमन विभाग की एनओसी, स्वीकृत फायर प्लान और मौके पर मौजूद सुरक्षा व्यवस्थाओं का मिलान किया जा सकता है। यदि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो आगे के कदम संबंधित प्रावधानों के अनुसार तय होंगे। अभी किसी निश्चित कार्रवाई या भवन को सील करने की पुष्टि नहीं हुई है।






