मुख्य बातें
- अक्टूबर-दिसंबर की आवंटन सूची में मध्य प्रदेश के 15 जिलों को एक भी पीजी डॉक्टर नहीं मिला।
- इंदौर को सबसे अधिक 69 और भोपाल को 30 डॉक्टर आवंटित किए गए।
- जनवरी 2026 से मेडिकल कॉलेजों और जिलों के बीच क्षेत्रवार पूल की व्यवस्था लागू की गई।
- स्वास्थ्य विभाग नियमों की समीक्षा कर रहा है, जबकि फाइमा के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने मौजूदा आवंटन रद्द कर नई सूची जारी करने की मांग की है।

मध्य प्रदेश में डीआरपी में डॉक्टरों की तैनाती को लेकर जारी अक्टूबर-दिसंबर की नई सूची ने जिला अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी दूर करने के उद्देश्य से संचालित डिस्ट्रिक्ट रेजीडेंसी प्रोग्राम (डीआरपी) के तहत प्रदेश के 15 जिलों को इस तिमाही में एक भी स्नातकोत्तर यानी पीजी मेडिकल डॉक्टर आवंटित नहीं हुआ। इसके विपरीत, इंदौर को 69 और भोपाल को 30 डॉक्टर मिले हैं। आंकड़ों का यह अंतर बताता है कि योजना का लाभ पूरे प्रदेश में समान रूप से नहीं पहुंच रहा है।
नई आवंटन सूची दो दिन पहले जारी हुई थी। इसके सामने आने के बाद यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि जिन जिला अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण व्यवस्था बनाई गई थी, वहां कुछ जिलों को लगातार दूसरी तिमाही में भी कोई डॉक्टर क्यों नहीं मिला। वहीं, बड़े शहरों में अपेक्षाकृत अधिक डॉक्टरों की तैनाती का आधार क्या है? स्वास्थ्य विभाग ने नियमों में बदलाव को दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता से जोड़ते हुए बताया है कि मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की जा रही है। दूसरी ओर, फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (फाइमा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. आकाश सोनी ने आवंटन रद्द कर नए सिरे से सूची जारी करने की मांग उठाई है।
डीआरपी में डॉक्टरों की तैनाती का अंतर
डीआरपी का मूल उद्देश्य स्नातकोत्तर चिकित्सा विद्यार्थियों को जिला अस्पतालों में निर्धारित अवधि के लिए प्रशिक्षण देना है, ताकि उन्हें बड़े मेडिकल कॉलेजों से बाहर मरीजों की देखभाल और अस्पताल की व्यावहारिक व्यवस्था का अनुभव मिल सके। इस कार्यक्रम से जिला अस्पतालों को भी अतिरिक्त चिकित्सकीय सहयोग मिलने की उम्मीद रहती है। लेकिन अक्टूबर-दिसंबर के आवंटन में सामने आया अंतर इस उद्देश्य के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठाता है।
एक तरफ इंदौर में 69 और भोपाल में 30 पीजी डॉक्टरों का आवंटन हुआ, वहीं आगर मालवा, अनूपपुर, अशोकनगर, बालाघाट, गुना, जबलपुर, मंडला, नीमच, पन्ना, सागर, सतना, सिवनी, शहडोल, सीधी और सिंगरौली को एक भी डॉक्टर नहीं मिला। यह स्थिति केवल दो शहरों और कुछ जिलों के बीच संख्या का अंतर नहीं है। इसका संबंध इस बात से भी है कि सरकारी प्रशिक्षण व्यवस्था का लाभ अलग-अलग क्षेत्रों तक किस हद तक पहुंच पा रहा है।
हालांकि, केवल आवंटन संख्या के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि किसी जिले की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था ठप है या बड़े शहरों में आवंटित सभी डॉक्टर नियमित अस्पताल सेवाओं में समान भूमिका निभा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से डीआरपी के तहत पीजी डॉक्टरों के आवंटन से संबंधित है। वास्तविक प्रभाव का आकलन करने के लिए जिला अस्पतालों में स्वीकृत और रिक्त पदों, विशेषज्ञ चिकित्सकों की संख्या, मरीजों के दबाव और प्रशिक्षणार्थियों की वास्तविक उपस्थिति जैसे आंकड़ों की भी जरूरत होगी।
नियम बदले तो बदला आवंटन का गणित
जनवरी 2026 से पहले डीआरपी के तहत पीजी मेडिकल विद्यार्थियों को प्रदेश के किसी भी जिले में प्रशिक्षण के लिए भेजा जा सकता था। इस व्यवस्था में किसी जिले को डॉक्टर मिलने की संभावना व्यापक क्षेत्र पर निर्भर करती थी। इसके बाद नियमों में बदलाव करते हुए मेडिकल कॉलेजों के लिए जिलों की सीमा तय की गई और आसपास के जिलों के समूह यानी पूल बनाए गए। अब संबंधित मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थी उसके निर्धारित क्षेत्र में आने वाले जिलों में ही प्रशिक्षण के लिए जा सकते हैं।
इस बदलाव का घोषित उद्देश्य दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों की पहुंच बढ़ाना था। स्वास्थ्य विभाग की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. प्रज्ञा तिवारी के अनुसार, पुरानी व्यवस्था में डॉक्टर दूरस्थ क्षेत्रों में जाने से बचते थे। इसी वजह से नए नियम लागू किए गए। उनका कहना है कि फिलहाल व्यवस्था की समीक्षा की जा रही है।
लेकिन नई व्यवस्था के परिणामों पर नजर डालें तो एक अहम सवाल उभरता है। यदि डॉक्टरों को निर्धारित क्षेत्रीय समूहों तक सीमित कर दिया जाए, तो उन जिलों की स्थिति क्या होगी जहां संबंधित पूल से पर्याप्त विद्यार्थी उपलब्ध नहीं हैं? क्या वहां आवंटन शून्य रह सकता है? और यदि ऐसा होता है, तो क्या नियमों में किसी वैकल्पिक व्यवस्था का प्रावधान है? उपलब्ध विवरण इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं देता, लेकिन जिलों के बीच सामने आए अंतर से इन मुद्दों की समीक्षा आवश्यक दिखाई देती है।
किसी भी प्रशासनिक बदलाव का मूल्यांकन केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से भी किया जाना चाहिए। यदि नई व्यवस्था से दूरस्थ जिलों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़नी थी, तो ताजा सूची में 15 जिलों का खाली रह जाना समीक्षा का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि समस्या डॉक्टरों की कुल उपलब्धता में है, क्षेत्रीय पूल की संरचना में, आवंटन के मानदंडों में या इन सभी कारकों के मेल में।
भोपाल और इंदौर में बढ़ती संख्या
डीआरपी के तहत भोपाल और इंदौर में आवंटित डॉक्टरों की संख्या में पिछले कुछ चरणों के दौरान उल्लेखनीय बदलाव दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भोपाल में जनवरी-मार्च की अवधि में 10 पीजी डॉक्टर पहुंचे थे। जुलाई-सितंबर में यह संख्या बढ़कर 48 हो गई, जबकि अक्टूबर-दिसंबर के लिए 30 डॉक्टर आवंटित किए गए। यानी पिछली तिमाही की तुलना में नई सूची में संख्या कम हुई है, लेकिन शुरुआती अवधि की तुलना में आवंटन अब भी अधिक है।
इंदौर में जनवरी-मार्च के दौरान 14 डॉक्टर आवंटित हुए थे। जुलाई-सितंबर में यह संख्या 35 तक पहुंची और अक्टूबर-दिसंबर के लिए 69 डॉक्टरों का आवंटन किया गया। इस तरह इंदौर की नई सूची में संख्या पिछली दोनों अवधियों के मुकाबले अधिक है। यह अंतर बताता है कि दोनों बड़े शहरों में भी आवंटन का क्रम एक जैसा नहीं रहा है।
इन आंकड़ों की व्याख्या करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि केवल किसी शहर में अधिक डॉक्टर आवंटित होने से यह अपने आप साबित नहीं होता कि वहां डॉक्टरों की जरूरत नहीं है। बड़े अस्पतालों में मरीजों का भार, प्रशिक्षण की क्षमता और संबंधित मेडिकल कॉलेजों के विद्यार्थियों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन जब दूसरी ओर कई जिलों को एक भी डॉक्टर नहीं मिलता, तब विभाग के लिए यह बताना जरूरी हो जाता है कि आवंटन की प्राथमिकताएं किस आधार पर तय की गईं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में संसाधनों का वितरण जरूरत के अनुरूप होना चाहिए। इसके लिए यह जरूरी है कि आवंटन के साथ उसका आधार भी स्पष्ट हो। यदि किसी जिले को अधिक डॉक्टर मिलते हैं, तो उसके पीछे प्रशिक्षण क्षमता, मरीजों की संख्या या अन्य मानदंडों की जानकारी सार्वजनिक होने से निर्णय की पारदर्शिता बढ़ सकती है। इसी तरह जिन जिलों को डॉक्टर नहीं मिले, वहां की स्थिति और भविष्य की योजना बताना भी उतना ही जरूरी है।
गुना से जबलपुर तक बदली तस्वीर
नई आवंटन सूची में गुना का उदाहरण भी ध्यान खींचता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गुना में जनवरी-मार्च के दौरान चार पीजी डॉक्टर पहुंचे थे, लेकिन अक्टूबर-दिसंबर के आवंटन में इस जिले को एक भी डॉक्टर नहीं मिला। इससे पता चलता है कि किसी जिले को पहले डॉक्टर मिलना इस बात की गारंटी नहीं है कि अगली तिमाही में भी आवंटन जारी रहेगा।
शहडोल की स्थिति और अधिक चिंताजनक सवाल उठाती है। जनवरी-मार्च में यहां सात पीजी डॉक्टर पहुंचे थे, लेकिन जुलाई-सितंबर और अक्टूबर-दिसंबर, दोनों अवधियों में किसी डॉक्टर का आवंटन नहीं हुआ। यानी लगातार दो तिमाहियों तक जिले को इस कार्यक्रम के तहत कोई नया डॉक्टर नहीं मिला। यदि किसी अस्पताल को अतिरिक्त चिकित्सकीय सहयोग की आवश्यकता है, तो इतनी लंबी अवधि तक आवंटन न होना स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं की योजना की समीक्षा की जरूरत दिखाता है।
जबलपुर में भी जनवरी-मार्च के दौरान आठ और उसके बाद जुलाई-सितंबर में नौ डॉक्टर आवंटित हुए थे। लेकिन अक्टूबर-दिसंबर की सूची में इस जिले का आवंटन शून्य है। खंडवा में पहले 11 और फिर 24 डॉक्टर आवंटित किए गए थे, जबकि ताजा अवधि के लिए केवल एक डॉक्टर मिला। इन उदाहरणों से साफ है कि अलग-अलग जिलों में आवंटन की दिशा और मात्रा में काफी अंतर आया है।
हालांकि, इन आंकड़ों से यह नहीं कहा जा सकता कि संबंधित जिलों में पहले से मौजूद सभी डॉक्टर चले गए हैं या अस्पतालों में चिकित्सकों की कुल संख्या घट गई है। आंकड़े केवल डीआरपी के तहत संबंधित तिमाही में आवंटित पीजी डॉक्टरों को दर्शाते हैं। इसके बावजूद, लगातार खाली रह जाने वाले जिलों की जरूरतों और कार्यक्रम के संचालन की समीक्षा करना जरूरी है, ताकि प्रशिक्षण के लिए डॉक्टरों की उपलब्धता और जिला अस्पतालों की आवश्यकताओं के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सके।
15 जिलों को नहीं मिला आवंटन
अक्टूबर-दिसंबर की सूची में जिन जिलों को एक भी पीजी डॉक्टर आवंटित नहीं हुआ, उनमें आगर मालवा, अनूपपुर, अशोकनगर, बालाघाट, गुना, जबलपुर, मंडला, नीमच, पन्ना, सागर, सतना, सिवनी, शहडोल, सीधी और सिंगरौली शामिल हैं। इन जिलों की भौगोलिक स्थिति, अस्पतालों की क्षमता और स्थानीय स्वास्थ्य जरूरतें एक जैसी नहीं हैं, इसलिए सभी के लिए एक ही कारण मान लेना सही नहीं होगा।
यह सूची इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डीआरपी का उद्देश्य जिला अस्पतालों में प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाने के साथ चिकित्सकीय सहयोग उपलब्ध कराना भी है। यदि किसी जिले को एक तिमाही में डॉक्टर नहीं मिलता, तो यह अस्थायी स्थिति हो सकती है। लेकिन यदि कोई जिला लगातार कई चरणों में खाली रहता है, तो उसकी वजह समझना और समाधान तलाशना अधिक जरूरी हो जाता है।
प्रशासन के लिए इस अंतर को समझने का एक व्यावहारिक तरीका यह हो सकता है कि हर जिले के आवंटन को संबंधित मेडिकल कॉलेज के पूल, उपलब्ध पीजी विद्यार्थियों, अस्पतालों की जरूरत और पिछले आवंटन से जोड़कर देखा जाए। इस तरह यह पता लगाया जा सकता है कि किन जिलों में विद्यार्थियों की उपलब्धता सीमित है, किन क्षेत्रों में नियमों के कारण विकल्प कम हुए हैं और कहां आवंटन प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत हो सकती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि शून्य आवंटन वाले जिलों की सूची को केवल आंकड़ों के रूप में न देखा जाए। जिला अस्पताल कई जगह आसपास के कस्बों और ग्रामीण आबादी के लिए इलाज का प्रमुख केंद्र होते हैं। ऐसे अस्पतालों में विशेषज्ञों या अन्य चिकित्सकों की कमी होने पर मरीजों को अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है। हालांकि, इस मामले में किसी खास जिले में मरीजों की यात्रा या उपचार पर वास्तविक असर का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसलिए प्रभाव की सीमा निर्धारित करने के लिए स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त जानकारी आवश्यक होगी।
दूरस्थ जिलों तक डॉक्टर पहुंचाने की चुनौती
स्वास्थ्य विभाग की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. प्रज्ञा तिवारी ने नई व्यवस्था की वजह बताते हुए कहा है कि पुरानी प्रणाली में डॉक्टर दूरस्थ क्षेत्रों में नहीं जाते थे। इसी समस्या के समाधान के लिए मेडिकल कॉलेजों के क्षेत्र निर्धारित किए गए और आसपास के जिलों को समूहों में बांटा गया। विभाग अब इन नियमों की समीक्षा कर रहा है।
इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि नीति में बदलाव के पीछे दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टर भेजने की व्यावहारिक चुनौती थी। केवल सभी जिलों के लिए एक समान पात्रता रखना पर्याप्त नहीं होता, यदि आवंटित डॉक्टर वास्तव में वहां पहुंचने को तैयार न हों। लेकिन दूसरी तरफ, नए नियम लागू होने के बाद भी यदि कई जिलों को डॉक्टर नहीं मिलते, तो व्यवस्था के परिणामों को समझने की जरूरत और बढ़ जाती है।
नीति बनाने में दो लक्ष्यों के बीच संतुलन जरूरी है। पहला, डॉक्टरों को ऐसे क्षेत्रों में भेजना जहां उनकी जरूरत है। दूसरा, ऐसी आवंटन प्रणाली तैयार करना जिसमें किसी जिले को केवल भौगोलिक या प्रशासनिक सीमाओं के कारण प्रशिक्षणार्थी मिलने की संभावना से वंचित न रहना पड़े। इन दोनों उद्देश्यों को पूरा करने के लिए स्पष्ट मानदंड, पर्याप्त डॉक्टरों की उपलब्धता और नियमित समीक्षा अहम हैं।
यदि किसी क्षेत्रीय पूल में विद्यार्थियों की संख्या सीमित है, तो उस पूल के भीतर कई जिलों की जरूरतों को एक साथ पूरा करना कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति में विभाग को यह देखना होगा कि आवंटन जरूरत, अस्पतालों की क्षमता और प्रशिक्षण के अवसरों के आधार पर कैसे किया जाए। यदि किसी जिले को एक तिमाही में डॉक्टर नहीं मिल पाता, तो अगली अवधि में उसे प्राथमिकता देने या वैकल्पिक पूल से प्रशिक्षणार्थी उपलब्ध कराने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। ये संभावित नीतिगत विकल्प हैं; उपलब्ध जानकारी यह नहीं बताती कि विभाग ने इनमें से किसी व्यवस्था को मंजूरी दी है।
फाइमा ने उठाए नियमों पर सवाल
फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (फाइमा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. आकाश सोनी ने वर्तमान आवंटन व्यवस्था पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि नियमों में किए गए बदलाव से एक अच्छी योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित हो रहा है। उन्होंने मौजूदा आवंटन सूची रद्द करके नए सिरे से सूची जारी करने की मांग की है।
यह मांग सीधे तौर पर आवंटन प्रक्रिया की समीक्षा और उसके परिणामों को सुधारने से जुड़ी है। जब एक ही राज्य में कुछ शहरों को बड़ी संख्या में पीजी डॉक्टर मिलते हैं और 15 जिलों को एक भी डॉक्टर नहीं मिलता, तो संबंधित पक्षों के लिए आवंटन के मानदंडों को स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है। नई सूची जारी करने की मांग के पीछे यही चिंता दिखाई देती है कि प्रशिक्षणार्थियों का वितरण जिला अस्पतालों की जरूरतों के अधिक अनुरूप होना चाहिए।
हालांकि, अभी उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि विभाग मौजूदा सूची रद्द करेगा या उसमें संशोधन करेगा। स्वास्थ्य विभाग की ओर से केवल नियमों की समीक्षा किए जाने की बात सामने आई है। इसलिए मौजूदा आवंटन रद्द होने या नई सूची जारी होने को तय निर्णय के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
इस मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम विभाग की समीक्षा का परिणाम होगा। यदि समीक्षा में यह पाया जाता है कि क्षेत्रीय पूल के कारण कुछ जिलों को लगातार आवंटन नहीं मिल पा रहा, तो व्यवस्था में बदलाव की संभावना पर विचार किया जा सकता है। वहीं, यदि शून्य आवंटन के पीछे संबंधित पूल में विद्यार्थियों की कमी जैसे कारण सामने आते हैं, तो समाधान का स्वरूप अलग हो सकता है। फिलहाल इन संभावनाओं पर कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।
जिला अस्पतालों के लिए इसका महत्व
जिला अस्पतालों की भूमिका केवल स्थानीय आबादी को प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। कई मामलों में वे ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों के मरीजों के लिए बड़े चिकित्सा संस्थानों तक पहुंचने से पहले सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य केंद्र होते हैं। यहां चिकित्सकों की उपलब्धता, विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंच और मरीजों को समय पर उपचार मिलने की क्षमता स्वास्थ्य व्यवस्था के अनुभव को प्रभावित करती है।
डीआरपी के तहत पीजी डॉक्टरों की तैनाती से जिला अस्पतालों को अतिरिक्त चिकित्सकीय सहयोग मिलने की उम्मीद रहती है। साथ ही, प्रशिक्षणार्थियों को अलग-अलग परिस्थितियों में काम करने का अवसर मिलता है। लेकिन किसी अस्पताल में प्रशिक्षणार्थियों की वास्तविक भूमिका उसके विभाग, प्रशिक्षण कार्यक्रम, उपलब्ध वरिष्ठ चिकित्सकों और अस्पताल की कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है। इसलिए आवंटित पीजी डॉक्टरों की संख्या को स्थायी चिकित्सकीय पदों का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
यह अंतर नीति निर्धारण में भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी जिले को डीआरपी के तहत डॉक्टर आवंटित नहीं होता, तो उससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि वहां डॉक्टर बिल्कुल नहीं हैं। इसी तरह किसी जिले को कई पीजी डॉक्टर मिलने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वहां चिकित्सकों की सभी जरूरतें पूरी हो गई हैं। वास्तविक तस्वीर समझने के लिए नियमित पदों पर कार्यरत डॉक्टरों, रिक्तियों, विशेषज्ञों, उपलब्ध सेवाओं और मरीजों की संख्या के आंकड़ों को साथ देखना होगा।
इसलिए डीआरपी में डॉक्टरों की तैनाती पर चर्चा का केंद्र केवल शहरों और जिलों की संख्या का अंतर नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या व्यवस्था उन अस्पतालों तक पर्याप्त सहयोग पहुंचा रही है जिन्हें इसकी जरूरत है। इसके लिए जिला-वार जरूरत का आकलन, आवंटन की पारदर्शिता और समयबद्ध समीक्षा तीनों आवश्यक हैं।
आवंटन में पारदर्शिता क्यों जरूरी
जब सरकारी कार्यक्रम के तहत डॉक्टरों को अलग-अलग जिलों में भेजा जाता है, तो आवंटन का आधार सार्वजनिक होना भरोसा बढ़ाने का महत्वपूर्ण तरीका है। यदि यह जानकारी उपलब्ध हो कि किसी मेडिकल कॉलेज के पूल में कितने पीजी विद्यार्थी हैं, कितने जिलों को उसमें शामिल किया गया है और आवंटन किस मानदंड पर हुआ है, तो परिणामों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
इसी तरह शून्य आवंटन वाले जिलों के लिए कारण दर्ज करना उपयोगी होगा। इससे पता चलेगा कि वहां प्रशिक्षणार्थी उपलब्ध नहीं थे, अस्पताल ने आवश्यकता नहीं बताई थी, निर्धारित पूल में पर्याप्त विकल्प नहीं थे या किसी अन्य प्रशासनिक कारण से आवंटन नहीं हो पाया। बिना इन विवरणों के केवल अंतिम सूची देखने से समस्या का सटीक कारण निर्धारित करना कठिन रहता है।
एक पारदर्शी व्यवस्था में आवंटन के साथ-साथ वास्तविक तैनाती और उपस्थिति की जानकारी भी महत्वपूर्ण हो सकती है। सूची में डॉक्टर आवंटित होना और उनका संबंधित अस्पताल में पहुंचकर प्रशिक्षण शुरू करना अलग-अलग चरण हैं। इसलिए कार्यक्रम की सफलता का आकलन केवल सूची से नहीं, बल्कि यह देखकर भी होना चाहिए कि आवंटित प्रशिक्षणार्थी निर्धारित अवधि में कहां पहुंचे, उनका प्रशिक्षण किस प्रकार संचालित हुआ और अस्पतालों को कितना व्यावहारिक सहयोग मिला।
इन बिंदुओं पर नियमित जानकारी उपलब्ध होने से विभाग को भी अपनी नीति का मूल्यांकन करने में मदद मिलेगी। यदि किसी नियम के लागू होने के बाद लगातार कुछ जिलों को डॉक्टर नहीं मिलते, तो समस्या का पता जल्दी लगाया जा सकता है। इससे अगली तिमाही की सूची में सुधार की गुंजाइश भी बनेगी।
डीआरपी में आगे क्या हो सकता है
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा है। डॉ. प्रज्ञा तिवारी के बयान के अनुसार, नए नियमों का रिव्यू किया जा रहा है। दूसरी ओर, डॉ. आकाश सोनी ने मौजूदा आवंटन रद्द कर नई सूची जारी करने की मांग की है। इन दोनों बातों के बीच अब निगाह इस पर रहेगी कि समीक्षा के बाद विभाग आवंटन व्यवस्था में कोई बदलाव करता है या मौजूदा प्रणाली को जारी रखता है।
यदि समीक्षा में क्षेत्रीय पूल की सीमाएं समस्या के रूप में सामने आती हैं, तो विभाग के सामने पूल की संरचना, जिलों की प्राथमिकता और वैकल्पिक आवंटन जैसे विषय हो सकते हैं। यदि मुख्य समस्या उपलब्ध पीजी विद्यार्थियों की संख्या है, तो समाधान के लिए अलग योजना की जरूरत पड़ सकती है। यह तय करने के लिए विस्तृत जिला-वार आंकड़ों की आवश्यकता होगी।
समीक्षा का एक उपयोगी परिणाम यह भी हो सकता है कि विभाग भविष्य की सूची के साथ आवंटन का आधार स्पष्ट करे। इससे उन जिलों के लिए भी स्थिति समझना आसान होगा जिन्हें डॉक्टर नहीं मिले। हालांकि, अभी तक उपलब्ध जानकारी में समीक्षा पूरी होने की समयसीमा, नई सूची की संभावना या किसी निश्चित बदलाव की घोषणा नहीं की गई है।
इस मामले को केवल एक तिमाही की सूची तक सीमित करके देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। शहडोल जैसे जिले में लगातार दो तिमाहियों तक शून्य आवंटन और गुना या जबलपुर जैसे जिलों में पहले आवंटन के बाद नई सूची में शून्य संख्या यह दिखाती है कि तिमाही-दर-तिमाही वितरण पर नजर रखना जरूरी है। इसी तरह खंडवा में पहले अधिक संख्या के बाद ताजा सूची में केवल एक डॉक्टर का आवंटन भी बदलाव की वजह समझने की जरूरत पैदा करता है।
योजना की सफलता का असली पैमाना
डीआरपी की सफलता केवल इस बात से तय नहीं हो सकती कि कितने पीजी डॉक्टरों को प्रशिक्षण के लिए आवंटित किया गया। यह भी देखना होगा कि डॉक्टर किन अस्पतालों तक पहुंचे, प्रशिक्षण कितनी प्रभावी तरह चला और जिन क्षेत्रों में चिकित्सकीय सहयोग की जरूरत अधिक थी, वहां कार्यक्रम कितना उपयोगी साबित हुआ। इन पहलुओं के बिना केवल संख्या के आधार पर पूरी योजना को सफल या असफल घोषित करना जल्दबाजी होगी।
फिर भी, अक्टूबर-दिसंबर की सूची में 15 जिलों का खाली रह जाना एक ऐसा तथ्य है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भोपाल को 30 और इंदौर को 69 डॉक्टर आवंटित होने के बीच यह अंतर पूछता है कि क्या मौजूदा नियम सभी क्षेत्रों की जरूरतों के लिए पर्याप्त लचीलापन रखते हैं। विभाग का समीक्षा करना इस सवाल की अहमियत को स्वीकार करने वाला कदम है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष समीक्षा के परिणाम और आगे किए जाने वाले बदलावों पर निर्भर करेगा।
डीआरपी में डॉक्टरों की तैनाती को अधिक प्रभावी बनाने के लिए जिला-वार जरूरत, मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध पीजी विद्यार्थियों, क्षेत्रीय पूल की क्षमता और पिछले आवंटनों के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करना जरूरी है। जिन जिलों को लगातार डॉक्टर नहीं मिल रहे, उनके लिए कारण और समाधान सार्वजनिक किए जाने चाहिए। इससे न केवल आवंटन प्रक्रिया पर भरोसा बढ़ेगा, बल्कि कार्यक्रम के मूल उद्देश्य—जिला अस्पतालों तक चिकित्सकीय सहयोग पहुंचाने—का वास्तविक मूल्यांकन भी संभव होगा।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी यही बताती है कि मध्य प्रदेश में डीआरपी की नई सूची ने वितरण में बड़ा अंतर सामने रखा है, विभाग नियमों की समीक्षा कर रहा है और फाइमा ने नई सूची की मांग की है। अब महत्वपूर्ण यह होगा कि समीक्षा से क्या निष्कर्ष निकलते हैं और क्या अगली आवंटन प्रक्रिया में शून्य आवंटन वाले जिलों की स्थिति में सुधार होता है।
7. FAQ Section
1. डीआरपी में डॉक्टरों की तैनाती की नई सूची में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
अक्टूबर-दिसंबर की आवंटन सूची में मध्य प्रदेश के 15 जिलों को एक भी पीजी डॉक्टर नहीं मिला। इसके विपरीत, इंदौर को 69 और भोपाल को 30 डॉक्टर आवंटित किए गए। यह अंतर जिला अस्पतालों में प्रशिक्षणार्थियों के वितरण और नियमों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है।
2. मध्य प्रदेश के किन जिलों को डीआरपी के तहत डॉक्टर नहीं मिले?
नई सूची में आगर मालवा, अनूपपुर, अशोकनगर, बालाघाट, गुना, जबलपुर, मंडला, नीमच, पन्ना, सागर, सतना, सिवनी, शहडोल, सीधी और सिंगरौली को कोई पीजी डॉक्टर आवंटित नहीं हुआ। यह आंकड़ा अक्टूबर-दिसंबर की अवधि से संबंधित है, न कि इन जिलों में मौजूद कुल डॉक्टरों की संख्या से।
3. डीआरपी में डॉक्टरों की तैनाती के नियम जनवरी 2026 में क्यों बदले गए?
स्वास्थ्य विभाग की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. प्रज्ञा तिवारी के अनुसार, पुरानी व्यवस्था में डॉक्टर दूरस्थ क्षेत्रों में जाने से बचते थे। इसके बाद मेडिकल कॉलेजों के लिए क्षेत्र निर्धारित कर आसपास के जिलों के पूल बनाए गए। विभाग अब इन नियमों की समीक्षा कर रहा है।
4. क्या डीआरपी में डॉक्टर नहीं मिलने का मतलब जिला अस्पताल में डॉक्टर बिल्कुल नहीं हैं?
नहीं। शून्य आवंटन का अर्थ है कि संबंधित तिमाही में डीआरपी के तहत कोई पीजी डॉक्टर आवंटित नहीं हुआ। इससे यह साबित नहीं होता कि जिले में नियमित चिकित्सक या अन्य डॉक्टर मौजूद नहीं हैं। अस्पताल की वास्तविक स्थिति जानने के लिए स्वीकृत पदों, रिक्तियों और कार्यरत डॉक्टरों की अलग जानकारी जरूरी है।
5. डीआरपी की नई सूची पर फाइमा ने क्या मांग की है?
फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. आकाश सोनी ने कहा है कि नियमों में बदलाव से योजना का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है। उन्होंने मौजूदा आवंटन रद्द कर नई सूची जारी करने की मांग की है। उपलब्ध जानकारी में इस मांग को स्वीकार किए जाने की पुष्टि नहीं है।
6. क्या मध्य प्रदेश में डीआरपी की आवंटन सूची दोबारा जारी होगी?
अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। स्वास्थ्य विभाग ने नियमों की समीक्षा किए जाने की बात कही है, जबकि फाइमा के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने नई सूची की मांग की है। आगे सूची में बदलाव होगा या नहीं, यह समीक्षा के निष्कर्ष और विभाग के निर्णय पर निर्भर करेगा।
7. डीआरपी में डॉक्टरों की तैनाती का जिला अस्पतालों पर क्या असर पड़ सकता है?
डीआरपी के तहत पीजी डॉक्टरों की तैनाती से जिला अस्पतालों को चिकित्सकीय सहयोग और प्रशिक्षण गतिविधियों में मदद मिलने की उम्मीद रहती है। हालांकि, वास्तविक असर अस्पताल की जरूरतों, डॉक्टरों की उपस्थिति और प्रशिक्षण की व्यवस्था पर निर्भर करेगा। किसी जिले में मरीजों को हुए वास्तविक नुकसान या लाभ का आकलन करने के लिए अतिरिक्त आंकड़े जरूरी हैं।





