मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखों से होने वाले प्रदूषण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विराट कोहली जैसी लोकप्रिय हस्तियों की मदद लेने का सुझाव दिया।
- अदालत ने अधिकारियों से पटाखों पर लागू प्रतिबंधों और नियमों का टीवी, अखबारों सहित विभिन्न माध्यमों से प्रचार करने को कहा।
- सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी ने स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 रिपोर्ट का हवाला देकर भारत में वायु प्रदूषण से 20.1 लाख से अधिक मौतों का आंकड़ा रखा।
- कोर्ट ने फिलहाल पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बजाय नियमों के पालन और संतुलित व्यवस्था पर जोर दिया।

दिवाली पर पटाखों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जनजागरूकता अभियान में लोकप्रिय खिलाड़ियों और दूसरी चर्चित हस्तियों को शामिल करने का सुझाव दिया है। अदालत ने कहा कि विराट कोहली जैसे मशहूर क्रिकेटर लोगों से बिना पटाखे जलाए दिवाली मनाने की अपील कर सकते हैं। कोर्ट के मुताबिक, टीवी, अखबार और अन्य माध्यमों से लोगों तक यह संदेश पहुंचाना जरूरी है कि त्योहार मनाने के लिए प्रदूषण बढ़ाने वाली गतिविधियां अनिवार्य नहीं हैं।
दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण से जुड़े मामले की सुनवाई गुरुवार, 29 अक्टूबर को जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने पटाखों पर लागू प्रतिबंधों के प्रचार, बच्चों को जागरूक करने और नियमों के प्रभावी पालन पर जोर दिया। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का समर्थन नहीं किया।
विराट कोहली जैसे सितारों से अपील का सुझाव
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीबी वराले ने सवाल उठाया कि लोगों को जागरूक करने के लिए अच्छे खिलाड़ियों और विभिन्न क्षेत्रों में सम्मानित व्यक्तियों की सेवाएं क्यों नहीं ली जा सकतीं। अदालत का सुझाव था कि लोकप्रिय हस्तियों के वीडियो संदेश या अपील रिकॉर्ड कराकर जनता तक पहुंचाई जा सकती है।
इस तरह के संदेशों में लोगों को प्रदूषण कम करने वाली दिवाली मनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। विराट कोहली का नाम इसी संदर्भ में उदाहरण के तौर पर सामने आया। अदालत ने किसी खिलाड़ी को औपचारिक रूप से अभियान से जोड़ने का आदेश नहीं दिया, बल्कि जागरूकता के लिए मशहूर चेहरों की लोकप्रियता का उपयोग करने का सुझाव रखा।
कोर्ट ने अधिकारियों से यह भी कहा कि पटाखों पर लागू पाबंदियों और नियमों की जानकारी केवल सरकारी आदेशों तक सीमित न रहे। टीवी, समाचार पत्रों और दूसरे जनसंचार माध्यमों के जरिए लोगों को स्पष्ट रूप से बताया जाए कि किन गतिविधियों की अनुमति है और किन पर रोक लागू है।
बच्चों को जागरूक करने पर जोर
अदालत ने दिवाली के सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को स्वीकार करते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखने की जरूरत बताई। सुनवाई के दौरान यह विचार भी सामने आया कि बच्चों को पटाखों से होने वाले नुकसान के बारे में समझाना जरूरी है।
कोर्ट की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू नई पीढ़ी की भूमिका रहा। बच्चों को यदि प्रदूषण के प्रभाव के बारे में सही जानकारी दी जाए, तो वे अपने परिवार में भी पटाखे न जलाने के लिए जागरूकता पैदा कर सकते हैं। इस दृष्टिकोण में केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय व्यवहार में बदलाव लाने पर जोर दिखाई देता है।
वायु प्रदूषण से 20.1 लाख मौतों का दावा
सुनवाई के दौरान अदालत की सहायता कर रहीं वरिष्ठ वकील और एमिकस क्यूरी उत्तरा बब्बर ने वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख किया। उन्होंने स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत में वायु प्रदूषण से 20.1 लाख से अधिक मौतें हुईं। उनके अनुसार, इन मौतों में 21 प्रतिशत पांच साल से कम उम्र के बच्चों की थीं।
यह आंकड़ा सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी की ओर से रिपोर्ट के हवाले से रखा गया था। इसका संदर्भ देश में प्रदूषण के व्यापक स्वास्थ्य प्रभावों की ओर ध्यान दिलाना था। उन्होंने यह भी बताया कि पटाखे जलने से पार्टिकुलेट मैटर यानी सूक्ष्म कण निकलते हैं, जो सांस के जरिए शरीर में पहुंचकर फेफड़ों और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
ग्रीन पटाखों की जांच पर सवाल
सुनवाई में ग्रीन पटाखों की बिक्री और उनकी वास्तविक पहचान को लेकर भी चिंता जताई गई। उत्तरा बब्बर ने कहा कि बाजार में बिक रहे पटाखे वास्तव में निर्धारित मानकों वाले ग्रीन पटाखे हैं या नहीं, इसकी जांच के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
उन्होंने दशहरा के दौरान दिल्ली-NCR में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) बढ़ने का भी उल्लेख किया। उनका पक्ष था कि पटाखों से निकलने वाले प्रदूषक कण पहले से खराब वायु गुणवत्ता की स्थिति को और गंभीर बना सकते हैं।
यहां ग्रीन पटाखों और सामान्य पटाखों के बीच अंतर समझना जरूरी है। ग्रीन पटाखों को निर्धारित मानकों के तहत अपेक्षाकृत कम प्रदूषणकारी विकल्प के रूप में विकसित किया गया है। हालांकि, उन्हें पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त मानना सही नहीं होगा। उनकी बिक्री और इस्तेमाल से जुड़े नियमों का पालन तथा उत्पादों की जांच इसलिए महत्वपूर्ण है।
कोर्ट ने पूर्ण प्रतिबंध पर क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि वह फिलहाल पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। कोर्ट के अनुसार, ऐसा प्रतिबंध लागू करने से दूसरी तरह की समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। इसके बजाय अदालत ने नियमों के पालन और त्योहार से जुड़ी परंपराओं तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया।
हालांकि, अदालत ने अधिकारियों को यह भी चेताया कि यदि पहले से जारी निर्देशों का पालन नहीं कराया गया, तो उसे सख्त रुख अपनाना पड़ सकता है। इससे स्पष्ट है कि कोर्ट का जोर केवल नए प्रतिबंध लगाने पर नहीं, बल्कि मौजूदा नियमों को प्रभावी ढंग से लागू कराने पर भी है।
30 सितंबर की सुनवाई में भी दिया था संकेत
इससे पहले 30 सितंबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह पटाखों पर पूरी तरह रोक लगाने का फैसला नहीं कर रहा है, लेकिन चौबीसों घंटे पटाखे जलाने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती। अदालत ने बीच का रास्ता निकालने और पटाखे चलाने के लिए सीमित समय तय करने की संभावना पर चर्चा की थी।
उस सुनवाई में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने CSIR-NEERI की सिफारिशों के आधार पर ग्रीन पटाखों को सीमित और शर्तों के साथ अनुमति देने से संबंधित नोट प्रस्तुत किया था। इसमें लाइसेंस प्राप्त निर्माताओं से उत्पादन, प्रतिबंधित रसायनों के इस्तेमाल पर रोक और निर्धारित मानकों के पालन जैसी शर्तों का उल्लेख था।
पिछले वर्ष अक्टूबर में भी सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल को सीमित अवधि तथा निर्धारित शर्तों के तहत अनुमति दी थी। उस समय दी गई छूट को परीक्षण के तौर पर देखा गया था।
अब नियमों के पालन पर रहेगा जोर
इस सुनवाई से सामने आया कि सुप्रीम कोर्ट प्रदूषण नियंत्रण के लिए जनजागरूकता और प्रशासनिक निगरानी, दोनों को जरूरी मान रहा है। विराट कोहली जैसे लोकप्रिय खिलाड़ियों से अपील कराने का सुझाव इसी सोच का हिस्सा है। अदालत के सामने चुनौती यह है कि दिवाली की परंपराओं का सम्मान करते हुए लोगों के स्वास्थ्य और स्वच्छ हवा के अधिकार की रक्षा कैसे की जाए।
फिलहाल, अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय जागरूकता, सीमित इस्तेमाल और मौजूदा निर्देशों के पालन पर जोर दिया है। अधिकारियों की ओर से इन निर्देशों को किस तरह लागू किया जाता है, यह प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
FAQ’s
1. सुप्रीम कोर्ट ने विराट कोहली का नाम क्यों लिया?
सुप्रीम कोर्ट ने लोकप्रिय खिलाड़ियों और सम्मानित हस्तियों की मदद से प्रदूषण के प्रति जागरूकता फैलाने का सुझाव दिया। विराट कोहली का नाम एक उदाहरण के तौर पर आया। अदालत का विचार था कि उनके जैसे चर्चित चेहरे लोगों से बिना पटाखे दिवाली मनाने की अपील करें तो संदेश अधिक लोगों तक पहुंच सकता है।
2. क्या सुप्रीम कोर्ट ने विराट कोहली को वीडियो बनाने का आदेश दिया है?
नहीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत ने विराट कोहली जैसे लोकप्रिय खिलाड़ियों की मदद लेने का सुझाव दिया है। किसी खिलाड़ी को व्यक्तिगत रूप से वीडियो बनाने या अभियान में शामिल होने का औपचारिक आदेश दिए जाने की जानकारी नहीं है। यह जागरूकता अभियान के लिए अदालत की ओर से दिया गया विचार था।
3. क्या सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है?
नहीं। सुनवाई में अदालत ने कहा कि वह फिलहाल पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि पटाखे बिना किसी नियम के जलाए जा सकते हैं। दिल्ली-NCR में लागू प्रतिबंधों, निर्धारित समय और अन्य शर्तों का पालन जरूरी है।
4. ग्रीन पटाखे क्या पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त होते हैं?
नहीं। ग्रीन पटाखे निर्धारित मानकों के तहत सामान्य पटाखों की तुलना में कम प्रदूषणकारी बनाने के उद्देश्य से तैयार किए जाते हैं। लेकिन उन्हें शून्य प्रदूषण वाला विकल्प नहीं माना जा सकता। उनकी वास्तविक गुणवत्ता, निर्माण मानक और बिक्री की निगरानी जरूरी है, ताकि निर्धारित मानकों के नाम पर सामान्य पटाखों की बिक्री न हो।
5. स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 रिपोर्ट में कितनी मौतों का उल्लेख हुआ?
सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी उत्तरा बब्बर ने इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए भारत में वायु प्रदूषण से 20.1 लाख से अधिक मौतों का आंकड़ा प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि इनमें 21 प्रतिशत मौतें पांच साल से कम उम्र के बच्चों की थीं। यह आंकड़ा अदालत में उनके द्वारा रिपोर्ट के संदर्भ में रखा गया था।
6. क्या दिल्ली-NCR में पटाखे जलाने के लिए समय निर्धारित किया जा सकता है?
30 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चौबीसों घंटे पटाखे जलाने की अनुमति देने से इनकार किया था और सीमित समय तय करने की संभावना पर चर्चा की थी। वास्तविक अनुमति और समय संबंधित आदेशों पर निर्भर करते हैं। पटाखे जलाने से पहले स्थानीय प्रशासन और अदालत के लागू निर्देशों की जानकारी लेना जरूरी है।






